सतना। मध्य प्रदेश के सतना जिले से करीब 40 किलोमीटर दूर बिरसिंहपुर कस्बे में स्थित गैवीनाथ धाम एक ऐसा शिव मंदिर है, जहां भगवान भोलेनाथ खंडित रूप में पूजे जाते हैं। यह शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है और श्रद्धालु इसे उज्जैन महाकाल का उपलिंग मानते हैं।
यह मंदिर अपनी अनोखी परंपरा, रहस्यमयी किवदंतियों और ऐतिहासिक घटनाओं के कारण पूरे प्रदेश में विशेष पहचान रखता है। सावन माह और महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
जहां टूटा शिवलिंग भी पूज्य है
आमतौर पर मंदिरों में अखंड शिवलिंग की पूजा होती है, लेकिन गैवीनाथ धाम में खंडित शिवलिंग ही श्रद्धा का केंद्र है। मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं यहां प्रकट हुए थे। भक्त मानते हैं कि यहां जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और चारों धाम का जल अर्पित करने से चारधाम यात्रा का पुण्य प्राप्त होता है।
औरंगजेब और खंडित शिवलिंग की कथा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मुगल शासक औरंगज़ेब ने वर्ष 1602 ईस्वी में इस मंदिर पर हमला किया था। सोना मिलने की लालसा में उसने शिवलिंग पर कई वार किए।
किवदंती के अनुसार
पहली चोट में दूध निकला,
दूसरी में खून,
तीसरी में मवाद,
चौथी में फूल-बेलपत्र,
और पांचवीं बार जीव-जंतु निकल पड़े।
इन चमत्कारी घटनाओं से भयभीत होकर औरंगजेब शिवलिंग को छोड़कर भाग गया। तभी से यह शिवलिंग खंडित अवस्था में ही पूजित है।
कैसे पड़ा ‘गैवीनाथ धाम’ नाम
मंदिर के पुजारी प्रधान के अनुसार पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि त्रेता युग में यहां राजा वीरसिंह का शासन था और तब इस स्थान को देवपुर कहा जाता था। राजा प्रतिदिन उज्जैन जाकर महाकाल के दर्शन करते थे। वृद्धावस्था में उन्होंने भगवान से अपने नगर में दर्शन देने की प्रार्थना की।
कहा जाता है कि भगवान महाकाल स्वप्न में प्रकट हुए और देवपुर आने की बात कही। एक ग्वाल परिवार के घर से शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसके बाद उसी स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया और शिवलिंग का नाम ‘गैवीनाथ’ रखा गया।
मंदिर परिसर में शिवलिंग के सामने माता पार्वती का मंदिर स्थित है। दोनों मंदिरों के बीच तालाब है, जहां श्रद्धालु मनोकामना पूर्ण होने पर ‘गठजोड़’ की परंपरा निभाते हैं।
हर सोमवार, सावन का हर दिन और महाशिवरात्रि पर गैवीनाथ धाम श्रद्धा, भक्ति और आस्था का महासंगम बन जाता है — जहां टूटा हुआ शिवलिंग भी करोड़ों दिलों की आस्था का सबसे मजबूत प्रतीक है।
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