
जबलपुर, यश भारत। मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार बने डेढ़ वर्ष बीत चुका है, लेकिन अब तक निगम-मंडल, बोर्ड और आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियाँ नहीं हो सकी हैं। अंदरखाने में खींचतान इतनी गहरी है कि “किस-किस को उपकृत किया जाए” का सवाल ही सबसे बड़ा राजनीतिक सिरदर्द बन गया है।
प्रदेश में करीब 45 से 50 निगम-मंडल और प्राधिकरणों की कुर्सियाँ खाली हैं। बीते फरवरी में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के आदेश पर पूर्व में की गई 46 नियुक्तियाँ निरस्त कर दी गई थीं, लेकिन नई सूची अब तक तैयार नहीं हो सकी। पार्टी सूत्रों के अनुसार, हर सीट पर कई दावेदार हैं संगठन में स्थान न पाने वाले पुराने कार्यकर्ता, हाल ही में पार्टी में आए नेता और विधानसभा चुनावों में सक्रिय रहे पदाधिकारी सभी अपनी-अपनी लॉबिंग में जुटे हैं।
भाजपा के संगठनात्मक ढाँचे में हालिया फेरबदल के बाद, अब ये पद राजनीतिक संतुलन साधने का जरिया बन गए हैं। वरिष्ठ नेताओं की उम्र और कैरियर भी इस खींचतान में दांव पर हैं। दिल्ली से भोपाल तक नेताओं के दौरे जारी हैं, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व की स्वीकृति के बिना फाइल आगे नहीं बढ़ पा रही।
सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रीय संगठन महासचिव बी. एल. संतोष की हाल की भोपाल यात्रा के दौरान इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। संकेत मिले हैं कि नियुक्तियों पर अब जल्द फैसला हो सकता है। लेकिन समीकरण इतने उलझे हैं कि हर निर्णय नए असंतोष को जन्म दे सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नियुक्तियाँ सिर्फ सत्ता संतुलन का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि संगठन की आंतरिक एकजुटता की परीक्षा भी हैं। कई पुराने कार्यकर्ता नाराज़ हैं कि चुनावों में मेहनत के बाद भी उन्हें पद नहीं मिला, जबकि कुछ नए चेहरे तेजी से उभर आए हैं।
दूसरी ओर, भाजपा नेतृत्व का प्रयास है कि जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरणों को साधते हुए किसी गुट को उपेक्षित महसूस न होने दिया जाए। यही कारण है कि सूची बार-बार टल रही है।
फिलहाल प्रदेश में “कुर्सी एक और दावेदार दर्जनों” की स्थिति बनी हुई है। हर बार लगता है कि नियुक्तियों की घोषणा अब होगी, परन्तु मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है।







