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एक तरफ पूजा पाठ तो दूसरी तरफ दरी पूजन भी होते रहे

दीपावली पर जुए की परंपरा बनी सामाजिक कुरीति

जबलपुर। यश भारत। दीपों के पर्व दीपावली को समृद्धि, सौभाग्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस शुभ अवसर के साथ जुए की परंपरा भी इतनी गहराई से जुड़ गई है कि अब यह एक गंभीर सामाजिक समस्या का रूप ले चुकी है। जुआ फड को दीपावली से जोड़कर आम बोलचाल की भाषा में दरी पूजन भी कहा जाता है।हालांकि की दरी पूजन वाले आमतौर पर शौकिया रूप से जुआ खेलते हैं लेकिन जो पेशेवर जारी हैं उनके लिए तो क्या दीपावली और क्या दशहरा क्या होली सब त्यौहार एक बराबर ही रहते हैं। ऐसे फडो में लाखों के दांव लगते हैं और जुआ करोड़ो का होता है। इन हाइटेक फडो पर किस्मत आजमाने दूर दराज के लोग भी आते हैं और जो लोग फड संचालित करते हैं उनके द्वारा खाने पीने से लेकर हर व्यवस्था मुहैया कराई जाती है। हालांकि पुलिस की कार्यवाही भी ऐसे फडो पर कम ही रहती है। अब इसके पीछे कारण क्या है यह तो पुलिस की भली भांति बता सकती है।
शहर से लेकर गांव तक दीपावली के पहले से गांव से लेकर शहर तक में जुआ फड आबाद हो जाते हैं। इसके अलावा

फार्म हाउस, गोदाम, खाली मकान और दुकानों में हाईटेक जुआ फड़ सजते हैं। इन फड़ों पर हजारों से लेकर लाखों रुपए तक के दांव लगाए जाते हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, कई जगहों पर एक रात में ही 5 से 10 लाख रुपए तक की बाज़ी लगाई जाती है।
शगुन या नशा?
कुछ लोग इसे “पारंपरिक शगुन” मानकर ताश पर हाथ आजमाते हैं, तो कुछ इसे मनोरंजन का साधन बताते हैं। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब यह शगुन लत, नशा और कर्ज में बदल जाता है।
“पहले त्योहारों में पूजा, भजन और पारिवारिक मेल-मिलाप होता था, अब रात होते ही जुआ और शराब के अड्डे सक्रिय हो जाते हैं,” — एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता की टिप्पणी।
पुलिस की कार्रवाई — ‘नाम की या काम की’?
दीपावली के पहले और बाद में जबलपुर पुलिस द्वारा कई इलाकों में छापेमारी की गई, दर्जनों जुआरी गिरफ्तार किए गए और रकम जप्त करने का दावा भी किया गया।
लेकिन इन कार्रवाइयों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे है।

सूत्रों की मानें तो अब पारंपरिक मोहल्लों की बजाय बाहरी क्षेत्रों में बने फॉर्म हाउस, रिसॉर्ट और होटल जुए के केंद्र बनते जा रहे हैं, जहां प्रवेश पास से होता है,सीसीटीवी नहीं रहते,
और पकड़ने में मुश्किलें होती हैं।
यह बदलाव जुआ खेलने की सोची-समझी रणनीति और पेशेवर नेटवर्क की ओर इशारा करता है।
सामाजिक परिणाम — टूटते परिवार, बिगड़ते युवा
दीपावली पर “शगुन” के नाम पर शुरू हुआ खेल कई लोगों के लिए आर्थिक और पारिवारिक विनाश का कारण बनता है:
• कर्ज में डूबे लोग,
• पारिवारिक कलह,
• युवा वर्ग में लत और अपराध की प्रवृत्ति।
“मैंने सोचा था सौ-दो सौ का खेल है, पर सुबह तक 40 हजार हार गया।” — एक पकड़े गए व्यक्ति ने स्वीकार किया।
जुए को परंपरा मानने की सोच बदले,परिवारों में इस विषय पर संवाद हो,बच्चों को ताश और जुए से दूर रखा जाऐ।दीपावली के मूल भाव “धर्म, दीप और दया” को प्रचारित करें।
दीपावली आत्मा के उजाले का पर्व है, न कि अविवेक और व्यसन का।
जुए को शगुन कहना, असल में संस्कृति के नाम पर अपराध को महिमामंडित करना है।
समय आ गया है कि हम यह सोचें — दीप जलाना है या घर जलाना है?

पुलिस के द्वारा हाल ही में सामने आई कुछ कार्यवाहियां

ऐसा नहीं है कि पुलिस के द्वारा जुआरियो और जुआ फड़ खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जाती हाल ही में पुलिस ने कुछ जुआ फडो पर छापा मार कार्यवाही भी की जिनमें प्रमुख रूप से कुछ कार्यवाही निम्नानुसार हैं।

अब तक की सबसे बड़ी कार्यवाही में गोरखपुर थाना क्षेत्र में पुलिस ने एक जुआ फड पर छापा मार कार्यवाही करते हुए तेरह जुआरी गिरफ्तार किये और उनकी बातचीत 73000 से ज्यादा नगद 14 मोबाइल एक मोटरसाइकिल और चार स्कूटी भी जब तक की। लेकिन सूत्रों की मांने तो जितनी जप्ती पुलिस दिख रही है उससे ज्यादा नगदी बरामद हुआ है। इसी तरह भेड़ाघाट और पाटन में भी कार्यवाही सामने आई है जिसमें जुआरी पकड़े गए थे। हालांकि इन दोनों कार्यवाहियों में भी जप्ती हजारों रुपए में ही हुई है। यह कारवाइयां दीपावली के के एक-दो दिन पहले की है लेकिन हो सकता है कि कोई बड़ी कार्यवाही भी पुलिस के द्वारा की गई होगी जिसकी जानकारी अभी साझा नहीं की गई है।

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