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सावन में भक्ति का अनूठा रंग: जबलपुर में हिंडोला उत्सव से झूले में झूल रहे बाल गोपाल

जबलपुर, यशभारत। सावन मास की हरियाली के साथ ही आध्यात्मिक नगरी जबलपुर में भक्ति और वात्सल्य का एक अनुपम पर्व शुरू हो गया है। हरियाली तीज के पावन अवसर से पुष्टिमार्गीय और गौरी संप्रदाय के वैष्णवों द्वारा अपने आराध्य लाला (बाल गोपाल) को झूले या हिंडोले में झुलाने की परंपरा का आगाज हो चुका है। यह मनमोहक उत्सव रक्षाबंधन तक पूरे सावन मास में चलेगा, जो भक्तों और भगवान के बीच के गहरे प्रेम को दर्शाता है।

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हिंडोला प्रेम और मनोरंजन का अलौकिक संगम
झंडा चौक निवासी राजा बताते हैं कि वैष्णव संप्रदाय में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि सावन के महीने में भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप को हिंडोले में झुलाने से वे अत्यंत प्रसन्न होते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि भक्तों द्वारा अपने लाला के मनोरंजन और उन्हें घर में लगाए रखने का एक अनूठा प्रयास है। यह वात्सल्य और अगाध प्रेम का प्रतीक है, जहां भक्त अपने आराध्य को संतान के समान मानते हुए लाड़-प्यार करते हैं। पुष्टिमार्गीय संप्रदाय में इसे श्हिंडोलाश् के नाम से जाना जाता है, जबकि अन्य वैष्णव संप्रदायों में इसे सामान्यतः श्झूलाश् कहा जाता है। इस दौरान भक्तगण अपने घरों को सजाते हैं, लाला के लिए विशेष रूप से अलंकृत झूले तैयार करते हैं और उन्हें विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट भोग अर्पित कर प्रेमपूर्वक झुलाते हैं।

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गौरीघाट, झंडाचौक पर होता है भव्य आयोजन
जबलपुर में इस दिव्य परंपरा को जीवंत रखने और उसे भव्य रूप प्रदान करने में कई परिवार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्हीं में से एक है गौरीघाट, झंडाचक स्थित राजा का निवास, जहां हिंडोला उत्सव का भव्य आयोजन होता है। यह स्थान इन दिनों भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं और बाल गोपाल को झूले में झूलते हुए देखने का अलौकिक आनंद प्राप्त करते हैं। यहां का वातावरण भक्ति और उल्लास से सराबोर रहता है, जो इस उत्सव को और भी खास बना देता है।

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तीन वर्षों से इस परंपरा को संवारने में जुटे हैं श्रद्धालु
इस पवित्र परंपरा से जुड़े एक श्रद्धालु राजा ने बताया कि वे पिछले तीन वर्षों से इस झूले के कार्यक्रम पर विशेष रूप से कार्य कर रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य इस सुंदर और आध्यात्मिक परंपरा को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना और इसके महत्व को समझाना है। उनका मानना है कि सावन के इस पावन मास में जब प्रकृति स्वयं हरे रंग की चादर ओढ़े होती है, तब भगवान कृष्ण को झूले में झुलाना भक्तों के मन में नई ऊर्जा और प्रसन्नता का संचार करता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करती है, बल्कि यह पारिवारिक सौहार्द और हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी अक्षुण्ण रखने का कार्य करती है। यह उत्सव जबलपुर की आध्यात्मिक पहचान को और भी गहराई प्रदान करता है।

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