रानी दुर्गावती द्वारा चढ़ाए गए विजय ध्वज के बाद से जारी है झंडा चढ़ाने की परंपरा, मदन महल के शारदा देवी मंदिर में लगता है सबसे प्राचीन श्रावणी मेला

जबलपुर यश भारत। मदन महल की सुरम्य वादियों में पहाड़ियों के बीच स्थित मां शारदा देवी का मंदिर लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है। वैसे तो यहां पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग दर्शन पूजन के लिए आते हैं लेकिन नवरात्र और सावन के महीने में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है। चारों तरफ हरियाली और और पहाड़ियों का मनोरम दृश्य यहां पूजन अर्चन के लिए आने वाले भक्तों को शांति और सुकून प्रदान करता है। हवन के महीने में यहां न केवल सबसे बड़ा प्राचीन श्रावणी मेला लगता है बल्कि यहां शताब्दियों से झंडा चढ़ाने की परंपरा भी चली आ रही है। सावन सोमवार का खास महत्व होने के कारण इस दिन शहर के कोने कोने और दूरदराज के लोग बड़ी संख्या में टोलियों के रूप में ढोल ढमाकों के साथ जुलूस की शक्ल में झंडा जुलूस लेकर पहुंचते हैं और माता को अर्पित कर झंडा चढ़ाते हैं। कहा जाता है की बड़ी संख्या में उन भक्तों की द्वारा भी झंडा चढ़ाया जाता है जिनकी मान्यता माता पूरी करती है। सावन महीने के शुक्रवार और सोमवार को यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।मदन महल, जबलपुर में स्थित मां शारदा देवी मंदिर का इतिहास 500 साल से भी पुराना है। यह मंदिर रानी दुर्गावती द्वारा 16वीं शताब्दी में बनवाया गया था। कहा जाता है कि रानी दुर्गावती ने मां शारदा की कृपा से ही मालवा के शासक बाज बहादुर को युद्ध में हराया था, जिसके बाद उन्होंने मंदिर में विजय ध्वज चढ़ाया था। तब से, मंदिर में झंडा चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है।
मदन महल और उसके आसपास का क्षेत्र कभी गोंडवाना साम्राज्य का हिस्सा था, जिसका शासन रानी दुर्गावती ने संभाला था।
रानी दुर्गावती और मां शारदा:
रानी दुर्गावती मां शारदा की भक्त थीं और माना जाता है कि उन्होंने ही मदन महल पहाड़ी पर मंदिर का निर्माण करवाया था।
1556 में, बाज बहादुर ने गोंडवाना साम्राज्य पर आक्रमण किया, लेकिन रानी दुर्गावती ने अपनी वीरता से उसे हरा दिया। इस विजय के उपलक्ष्य में, रानी ने मां शारदा को विजय ध्वज चढ़ाया था।
और तब से, मंदिर में झंडा चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है, जो आज भी जारी है।
मंदिर का महत्व:
यह मंदिर न केवल जबलपुर बल्कि पूरे भारत से भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।
मदन महल किला, जो कि मदन महल पहाड़ी पर स्थित है, 11वीं शताब्दी में राजा मदन शाह द्वारा बनवाया गया था।
यह किला एक सैन्य चौकी और प्रशासनिक केंद्र के रूप में इस्तेमाल होता था।
शारदा मंदिर, मदन महल किले के पास ही स्थित है।
कहा जाता है कि मंदिर और किले के बीच कुछ गुप्त सुरंगें भी हैं।
आज का मंदिर
आज, मदन महल शारदा मंदिर एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, जहां नवरात्रि और सावन के दौरान विशेष उत्सव होते हैं।
दूर-दूर से भक्त मंदिर में दर्शन करने और अपनी मनोकामनाएं मांगने आते हैं।
यह मंदिर विजय और इच्छाओं की पूर्ति का प्रतीक माना जाता है।
अद्भुत है मां शारदा का मंदिर
भारत अपनी विविध संस्कृति के साथ-साथ अपने आश्चर्यों के लिए खूब जाना जाता है। अजीबोगरीब परंपराएं और मान्यताएं यहां गहराई से जुड़ी है। भारत का लंबा पौराणिक इतिहास ऐसे असंख्य रीति रिवाजों से भरा पड़ा है। यह विदित है कि भारत में लाखों देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। विभिन्न मान्यताओं और अवतारों में भगवान भारत की चारों दिशाओं में विराजमान हैं। मुख्यत : हिन्दू धर्म से जुड़े लोग कठोर धार्मिक कर्मकांडों का प्रयोग करते हैं, जीवन से जुड़ी समस्याओं से लेकर मोक्ष प्राप्ति की सभी प्रक्रिया इन्हीं जटील कर्मकांडों से होकर गुजरती है। आज हम आपको एक ऐसे ही अद्भुत मंदिर के विषय में बताने जा रहे हैं जिससे एक अनोखी परंपरा जुड़ी है। माना जाता है कि इस मंदिर में कभी झंडा चढ़ाने से जोरों की बारिश हुई थी।
स्थानीय जानकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण गोंडवाला साम्राज्य की वीरांगना दुर्गावती से ने सूखा पड़ने पर करवाया था। कहा जाता है कि किसी समय गोंडवाला साम्राज्य में भारी सूखा पड़ा था। सूखे से निजात पाने के लिए वीरांगना दुर्गावती ने माता शारदा का आह्वान किया था। जिसके बाद मां शारदा का मंदिर बनवाया गया। कहा जाता है दुर्गावती ने सावन के सोमवार में मंदिर पर झंडे अर्पित किए थे। झंडे चढ़ाने के बाद तेज बारिश शुरू हुई थी और सूखे से राहत मिली थी।
शक्ति का केंद्र, यहां मिलती है शांति
श्रद्धालु यहां भक्ति भाव से बड़े-बड़े झंडे चढ़ाते हैं। बारिश मेंं बिखरी प्रकृति की अद्भुत छटा देखते ही बनती है।
मंदिर का निर्माण गोंडवाना साम्राज्य की वीरांगना रानी दुर्गावती ने कराया था। मदन महल पहाड़ी के नीचे पर ऊंचाई पर स्थित मां शारदा मंदिर अपने आप में अनूठा है। मनमोहक हरियाली के बीच ऊंचाई पर स्थित शारदा मां का मंदिर अलौकिक शक्ति केंद्र है। आध्यात्मिक, पौराणिक महत्व के कारण एकांत साधना का उत्कृष्ट धार्मिक स्थल भी है। मंदिर का निर्माण गोंडवाना साम्राज्य की वीरांगना रानी दुर्गावती ने कराया था।
इतिहास के जानकार तो यह भी बताते हैं कि रानी दुर्गावती खुद यहां मां शारदा का पूजन करने आती थीं। इस ऐतिहासिक मंदिर में सावन के महीने में मेला भी लगता है। श्रद्धालु यहां भक्ति भाव से बड़े-बड़े झंडे चढ़ाते हैं। बारिश मेंं बिखरी प्रकृति की अद्भुत छटा देखते ही बनती है। कहा जाता है कि वीरांगना रानी दुर्गावती के स्वप्न में मां शारदा माता आई थीं, उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया था। वे यहां प्रतिदिन मां शारदा पूजन करने भी आती थीं।








