
2025 में हुए 335 अग्निकांड : दुर्घटनाओं से नहीं कोई सबक
घर-दुकान- अस्पताल – बाजार- रेलवे टैंकरों में हुए हादसे, करोड़ों का नुकसान नहीं हुई जनहानि
जबलपुर, यह भारत। जबलपुर संस्कार, संस्कृति और साहित्य के लिए पहचानी जाने वाली संस्कारधानी जबलपुर ने वर्ष 2025 में जो देखा, वह केवल घटनाओं की सूची नहीं, बल्कि एक साल का डर, अफरा-तफरी और चेतावनी है। पूरे साल में 365 दिन होते हैं, लेकिन इन 365 दिनों में शहर 335 बार आग की चपेट में आया। यानी लगभग हर दिन शहर के किसी न किसी कोने से धुएं के गुबार उठते रहे। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है, यह उस असुरक्षा का संकेत है, जिसमें पूरा शहर साल भर जीता रहा। नगर निगम फायर अधीक्षक कुशाग्र ठाकुर के अनुसार वर्ष 2025 में दर्ज 335 अग्निकांडों में सबसे ज्यादा घटनाएं बाजारों, दुकानों और घनी आबादी वाले इलाकों में हुईं। राहत की बात यह रही कि दमकल विभाग की तत्परता और समय पर कार्रवाई से अधिकांश मामलों में जनहानि नहीं हुई, लेकिन करोड़ों रुपये की संपत्ति आग में स्वाहा हो गई।
बाजार जले, कारोबार जला, और डगमगाया भरोसा
शहर के मालवीय चौक से लेकर घमंडी चौक तक आग ने व्यापारियों की नींद उड़ाए रखी। कहीं मोबाइल शॉप जलकर खाक हुई तो कहीं तीन मंजिला कपड़े की दुकान लपटों में घिर गई। घमंडी चौक स्थित दुकान में लगी रात की आग ने यह दिखा दिया कि आग दिन और रात का फर्क नहीं करती। इन घटनाओं में कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन व्यापारिक नुकसान ने कई लोगों को सालों की कमाई पल भर में खत्म कर दी।
वही पटाखा बाजार की आग तो पूरे साल की सबसे भयावह घटनाओं में गिनी गई। धमाकों की आवाज से पूरा इलाका दहल उठा। देखते ही देखते दर्जनभर से ज्यादा दुकानें आग की चपेट में आ गई। 12 दमकल वाहनों ने मोर्चा संभाला, लेकिन तब तक लाखों-करोड़ों का माल जात चुका था। यह घटना साफ कह गई कि खतरनाक कारोबार और कमजोर सुरक्षा व्यवस्था एक साथ जानलेवा साबित हो सकती है।
अस्पतालों में भी उठा धुआं, मरीजों की सांसें थमीं
2025 में आग ने यह भी साबित कर दिया कि इलाज के मंदिर भी सुरक्षित
रेलवे ट्रैक पर दौड़ी दहशत, घर छोड़कर भागे लोग
25 अप्रैल 2025 को भिटोनी रेलवे स्टेशन पर पेट्रोल-डीजल से भरे टैंकर में लगी आग ने पूरे जबलपुर को हिला दिया। आग लगते ही स्टेशन और आसपास के इलाकों में भगदड़ मच गई। हजारों लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भागे। हालात की गंभीरता को देखते हुए जबलपुर और अधारताल रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों को रोका गया। यह वही इलाका है, जहां शाहपुरा महाकौशल क्षेत्र का बड़ा पेट्रोलियम डिपो स्थित है। नगर निगम, शाहपुर नगर पंचायत और पेट्रोलियम डिपो के फायर फाइटरों ने संयुक्त रूप से आग पर काबू पाया। नगर निगम कमिश्नर प्रीति यादव, पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। अगर समय पर नियंत्रण नहीं होता, तो यह हादस्य शहर के इतिहास को सबसे बड़ी आगजनी बन सकता था।
नहीं। 30 अप्रैल को नेमा हार्ट हॉस्पिटल में रात के समय लगी आग ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए। सौभाग्य से अस्पताल में उस समय केवल दो मरीज थे, जिन्हें सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। नगर निगम को दमकल टीम ने करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। इसके कुछ समय बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग में भी आग लगी। एसी से उठे धुएं और तेज आवाज के बाद आग फैल गई। डॉक्टर और मरीज जान बचाकर बाहर भागे। हालांकि 15 मिनट में आग पर काबू पा लिया गया, लेकिन यह घटना जून 2022 के बड़े अस्पताल अग्निकांड की याद दिला गई। इन घटनाओं के बाद कलेक्टर दीपक सक्सेना ने शहर के सभी अस्पतालों के फायर ऑडिट
के आदेश दिए, लेकिन सवाल यह है कि क्या अग्निकांड के बाद ही जागना जरूरी है?
घर भी जले, सुकून भी जला
रेलवे कॉलोनी, भिटीनों में गैस सिलेंडर ब्लास्ट से दो मंजिला मकान का जलना पूरे इलाके के लिए सदमे जैसा था। धमाका इतना तेज था कि लपटें एक किलोमीटर दूर तक दिखाई दीं। करीब 5 लाख रुपये का घरेलू सामान जलकर खाक हो गया। सौभाग्य से परिवार सुरक्षित रहा, वरना परिणाम भयावह हो सकता था। वही गलगला मोहल्ले में तीन मंजिला जनरल स्टोर में लगी आग ने फिर यह साबित किया कि आग लगने का कारण
एक नजर में साल 2025 की सच्चाई पर
कुल दिन
कुल अग्निकांड
औसत
सबसे ज्यादा घटनाएं
जनहानि
आर्थिक नुकसान
365
335
: लगभग हर दिन एक आग
दुकाने, बाजार, अस्पताल और रेलवे
: नहीं
: करोड़ों रुपये (अनुमानित)
भले अज्ञात हो, नुकसान तय होता है। करीब 50 लाख रुपये का माल जल गया।
आग बनी अपराध का हथियार
2025 में आग केवल हादसा नहीं रही, बल्कि अपराध का हथियार भी बनी। डुमना रोड पर मारपीट के बाद होटल में आग लगा दी गई। तिलवारा क्षेत्र में उधारी विवाद में दुकान और बाइकों को आग के हवाले कर दिया गया। सब्जी मंडी में होटल की चिंगारी से कई दुकानें जल गई।
अंत में…
साल 2025 गुजर गया, लेकिन आग की घटनाएं सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहीं। ये घटनाएं उन खामियों की तरफ इशारा करती हैं, जिन्हें हम रोज देखते हुए भी नजरअंदाज कर देते हैं। कहीं जर्जर बायरिंग है, कहीं गैस सुरक्षा की अनदेखी, तो काहीं फायर सेफ्टी नियम सिर्फ कागजों में सिमटकर रह गए हैं। राहत की बात यही रही कि समय पर दमकल और प्रशासन की सक्रियता से अधिकांश मामलों में जान बच गई, लेकिन हर बार किस्मत का साथ मिले, इसकी गारंटी नहीं होती। बाजार ही, अस्पताल हों या रिहायशी इलाके आग ने यह साफ कर दिया कि खतरा किसी एक जगह तक सीमित नहीं है। अब जब साल खत्म हो चुका है, तो जरूरी है कि इन घटनाओं को सिर्फ बीते साल की खबर मानकर न छोड़ दिया जाए। फायर ऑडिट, जागरूकता और सुरक्षा इंतजाम अगर समय रहते मजबूत नहीं किए गए, तो अगला साल भी इन्हीं धुएं भरी खबरों के साथ शुरू हो सकता है। संस्कारधानी ने इस साल आग से जूझते हुए बहुत कुछ सहा है। सवाल बस इतना है कि क्या आने वाले साल में हम इन घटनाओं से सबक लेंगे, या फिर आंकड़े और बढ़ेंगे।







