वोटर्स हाजिर हों…एसआईआर : कांग्रेस-भाजपा दोनों मैदान में, गली-मोहल्लों में चुनाव जैसा माहौल

कटनी, ( आशीष सोनी) । बिन मौसम ही शहर में इन दिनों चुनावी माहौल बन गया है। न कोई चुनाव है, न कोई उम्मीदवार लेकिन गली-मोहल्लों में चुनावी बयार बह रही है। घर-घर वैसे ही गुहार लग रही है, जैसे चुनाव में वोट डालने के दौरान लगती है। कोई ‘अपना’ छूट न जाए, इसकी जबरदस्त चिंता की जा रही है। इस काम में वैसे तो दोनों प्रमुख राजनीतिक दल दमखम के साथ मैदान में हैं, लेकिन दम ‘कमलदल’ का ही नजर आ रहा है। कांग्रेस भी मैदान में है, लेकिन उसकी तैयारी कच्ची-पक्की नजर आ रही है। वह नजर तो रख रही है, लेकिन जमीन पर नदारद-सी है। जमीन पर कमलदल वाले ज्यादा सक्रिय नजर आ रहे हैं। इस दल के लोगों को पूर्व से बने हुए बूथ मैनेजमेंट का जबरदस्त फायदा मिल रहा है। बावजूद इसके रत्तीभर ढील नहीं दी जा रही है। लिहाजा दल के पार्षद से लेकर विधायक तक मैदान में उतरे हुए हैं। सांसद मंत्री भी बख्शे नहीं गए और उनके हाथों में भी ‘कागज-पत्तर’ थमा दिए गए हैं।
बिहार में ये मामला कांग्रेस सहित समूचे महागठबंधन ने जोरशोर से उठाया था, उसी राज्य में कांग्रेस सहित पूरा का पूरा महागठबंधन चुनाव में जमींदोज हो गया। इस बड़ी पराजय ने कांग्रेस की उन उम्मीदों को भी धूलधूसरित कर दिया, जो मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्यक्रम के रुक जाने पर लगी थीं। न ये कार्यक्रम बिहार में रुका, न एमपी सहित अन्य राज्यों में रुकता नजर आया। लिहाजा कांग्रेस को बेमन से आनन फानन में इस मुद्दे पर तैयारी करना पड़ी। कांग्रेस ने भोपाल से मिले निर्देशों कर बैठकें आयोजित की। जिला शहर और ग्रामीण कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर रसूल खान और एआईसीसी के सचिव हरीश चौधरी की मुलाकात भी कार्यकर्ताओं से कराकर एसआईआर के मुद्दे पर जमीनी जोश भरने की कोशिशें जरूर की हैं, लेकिन बूथ स्तर पर कांग्रेस की तैयारियां भाजपा के मुकाबले फीकी हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों ने पार्टी पार्षदों को भी काम पर लगाया है और वरिष्ठ नेताओं से भी गिले-शिकवे दूर कर तालमेल बैठाया गया है ताकि वे भी इस अभियान का हिस्सा बनें। उधर कांग्रेस का आरोप है कि बीएलओ सत्तारूढ़ दल के दबाव-प्रभाव में काम कर रहे हैं। ऐसे में बीएलओ भी सतर्कता से काम कर रहे और वे अपनी कार्यशैली में किसी दल विशेष का ठप्पा लगने से बच रहे हैं।
एसआईआर यानी कमलदल का अभियान..!!
भाजपा को इस पूरे अभियान में अपने बूथ मैनेजमेंट का भरपूर फायदा मिल रहा है। पार्टी के लिए मतदाता सूची शुद्धिकरण का काम एक तरह से दल का ही कार्यक्रम हो गया है और वह इस काम में वैसे ही डटकर मैदान में है, जैसे भाजपा कार्य से कोई अभियान सौंपा गया है। बिहार में मिली प्रचंड जीत ने ने भाजपाइयों को इस अभियान के प्रति उत्साह से भर दिया है। पार्टी ने इस काम में पूरी ताकत झोंक दी है। विधानसभावार शुरु की गई तैयारियां अब वार्डवार होते हुए बूथ तक पहुंच गई हैं। न सिर्फ बूथ इकाइयां, बल्कि पार्षद भी अलसुबह से वैसे ही सड़क पर उतर रहे हैं, जैसे मतदान वाले दिन मतदान कराने निकलते हैं। 24 घंटे चुनावी मोड में रहने वाले कमलदल को कांग्रेस की तुलना में कोई खास दिक्कतें आ भी नहीं रहीं। पार्षदों का जनता से सीधे जुड़ाव अभियान को गति दे रहा है।
‘चूक गए तो चप्पल घिस जाएगी’ का भय
भाजपा ने वार्ड के हिसाब से हर बूथ प्रभारी तय कर दिए हैं। इनके साथ कौन बीएलओ हैं, उनके भी नाम, फोन नंबर की सूची सोशल मीडिया पर है। नियमित आकलन भी हो रहा है। नेताओं को काम करने का सबूत भी वाट्सएप ग्रुप पर फोटो सहित देना पड़ रहा है। कोई भी ‘झांकीबाजी’ से काम नहीं चला सकता। न पार्षद, न विधायक। मंत्री से सांसद तक जनता के बीच बैठके ले रहे हैं। एक तरह से चुनावी माहौल बना हुआ है। इस माहौल में नेताओं के वाट्सएप ग्रुप अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन ग्रुप्स में आ रही दिक्कतों का समाधान कैसे हो, यह बताया जा रहा है। भाजपाई आम मतदाता को जागरुक भी कर रहे हैं कि चूक गए तो फिर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाना पड़ेंगे। इस ‘भय’ का असर दिख भी रहा है और लोग आगे रहकर फॉर्म 6 मांग रहे और बीएलओ से संपर्क कर रहे हैं।
SIR का तनाव चुनाव से भी अधिक, पर आयोग की नजर में यह ड्यूटी नहीं
एसआईआर के तनाव में राजस्थान, गुजरात सहित देशभर में डेढ़ दर्जन बीएलओ की मौत हो चुकी है। इनमें से 5 मप्र के हैं। बीएलओ का कहना है, एसआईआर का काम बेहद तनाव वाला है। इस बीच मप्र पिछड़ा वर्ग अधिकारी-कर्मचारी संघ समेत तमाम संगठनों ने मांग उठाई है कि चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मियों के निधन पर 15 लाख की अनुग्रह राशि मिलती है। एसआईआर चुनावी ड्यूटी का हिस्सा है, लेकिन यह लाभ नहीं दिया जा रहा है।









