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हमारा धर्म हमारी परंपरा : तर्पण के साथ पितरों का आव्हान… यह है महत्व

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नरसिंहपुर यशभारत। पितृ पक्ष की शुरूआत हो गयी है तर्पण के साथ पितरों के आव्हान का सिलसिला भी शुरू हो गया है। सुबह से ही घरों में पितरों के आव्हान के लिए तर्पण की विधि पूरी की गई। मान्यतानुसार जल से तर्पण करने से पूर्वज अपने घरों में आते है और घर के परिवार को आर्शीवाद देते है। इसी कामना से तर्पण की विधि की जाती है। कोई नदी की तट पर तो कोई सरोबर में कुशा धारण कर तर्पण की विधि पूरी करता है। वहीं आज के समय में घरों में भी स्नान के बाद तर्पण की विधि की जाने लगी है। इस बार पितृ पक्ष 7 सितंबर से प्रारंभ हो गये है जो 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगे।

पितृ पक्ष के प्रारंभ होते ही घरों के मुख्य द्वार पर स्वागत के लिए आटे से रंगोली बनाकर फूल डालकर पितरों का स्वागत किया जाता है। पितृ पक्ष के पहले दिन से ही इस विधि को घरों में किया गया। पितृ पक्ष में पूर्वज अपने घरों में आते है और परिवार को देखकर जाते है। पितृ दोष दूर करने का यह पर्व पुण्यदायी माना गया है है। इसलिए हर घर में अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करना प्रारंभ हो गया है। जानकारी के अनुसार 16 दिनों तक तर्पण की विधि को करते हुए पूर्वजों का स्मरण किया जाएगा। 16 दिन इस लिये क्योंकि एक माह में दो पक्ष होते है, जिसमें एक पक्ष में पूर्णिमा व एक पक्ष में अमावस्या होता है इसलिए जिन पितरों की मृत्यु पूर्णिमा की तिथि को हुई होती है उनका तर्पण व श्राद्ध पूर्णिमा के दिन किया जाता है यही वजह है कि पितृ पक्ष की शुरूआत पूर्णिमा की तिथि से मानी जाती है। 

मृत्यु की तिथि पर होगा श्राद्ध 

पितृ पक्ष में पूर्वजों व पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु की तिथि के आधार पर होता है मान्यता है कि जिस तिथि में पूर्वज परलोक गमन करते है उसी तिथि में उनका श्राद्ध कर आत्मा की शांति व मोक्ष के लिए प्रार्थना की जाती है। इसलिए हर घर में पूर्वजों के परलोक गमन की तिथि के आधार पर होम देते हुए उड़द दाल का बड़ा, पुड़ी सहित अन्य व्यंजन अर्पित किया जाएगा। 

परिवार होता है एकजुट 

पितृ पक्ष पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है यह एक ऐसा पर्व है जब घर परिवार के लोग जुटकर अपने पूर्वजों को याद करते है इस दौरान मेल मिलाप के साथ पूर्वजों को याद किया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तक का समय श्राद्ध या महालय पक्ष कहलाता है। इस अवधि के 16 दिन पितरों अर्थात श्राद्ध कर्म के लिए विशेष रूप से निर्धारित किये गए हैं। यही अवधि पितृ पक्ष के नाम से जानी जाती है। पितृ पक्ष में किये गए कार्यों से पूर्वजों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है। श्राद्ध पक्ष का संबंध मृत्यु से होता है। इस मौके पर पितर मृत्यु लोक से धरती पर 16 दिनों के लिए धरती पर आते हैं। इस अवधि में पितर हमसे और हम पितरों के करीब आ जाते हैं इसलिए शुभ और मांगलिक कार्यों को त्यागकर पितरों के प्रति सम्मान और एकाग्रता रखते हैं। श्राद्ध पक्ष में पितरों के अलावा ब्राह्राण, गाय, श्वान और कौए को ग्रास निकालने की परंपरा है। गाय में सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है इसलिए गाय का महत्व है। वहीं पितर पक्ष में श्वान और कौए पितर का रूप होते हैं इसलिए उन्हें ग्रास देने का विधान है। पितृपक्ष में इनका खास ध्यान रखने की परंपरा है।

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