मिलावट पर सख्ती, दामों पर नरमी, अधिकारियों का दोहरा मापदण्ड सबसे बड़े उत्पादक जिले में सबसे महंगा दूध
लूट पर नेता हुए गूंगे, प्रशासन हुआ अंधा, जनता परेशान

मिलावट पर सख्ती, दामों पर नरमी, अधिकारियों का दोहरा मापदण्ड
सबसे बड़े उत्पादक जिले में सबसे महंगा दूध
लूट पर नेता हुए गूंगे, प्रशासन हुआ अंधा, जनता परेशान
यश भारत टीम मध्यप्रदेश का जबलपुर शहर अब प्रदेश में सबसे महंगा दूध बेचने वाले शहरों में शुमार हो गया है। जहां राज्य की राजधानी भोपाल और व्यावसायिक शहर इंदौर में दूध की कीमतें ?56 से ?67 प्रति लीटर के बीच बनी हुई हैं, वहीं जबलपुर में यही दूध ?68 तक बिक रहा है। यह स्थिति खासकर पैक्ड दूध ब्रांड्स जैसे अमूल और सांची के लिए है।लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि शहर में बिकने वाला खुला दूध, जो आमतौर पर स्थानीय डेयरियों से आता है, उसकी कीमतें ?75 से लेकर ?80 प्रति लीटर तक पहुंच चुकी हैं। ये कीमतें प्रदेश के किसी भी शहर से कहीं ज्यादा हैं। नामचीन ब्रांड्स भी सस्ते, शहर में दूध क्यों महंगा?
यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि पैक्ड दूध के मुकाबले खुले दूध की कीमत जबलपुर में 10 से 15 रुपये प्रति लीटर अधिक है, जबकि गुणवत्ता या उपलब्धता में कोई स्पष्ट अंतर नहीं दिख रहा है।
स्थानीय समाजसेवी शिवेंद्र तिवारी कहते हैं,
“हमने कई बार प्रशासन को शिकायत दी कि खुले दूध के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। न जनप्रतिनिधि कुछ बोल रहे हैं, न अफसर कुछ करते हैं। दूध माफिया के खिलाफ मांग उठी अब शहर में उपभोक्ताओं के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि दूध विक्रेताओं की मोनोपॉली (एकाधिकार) खत्म होनी चाहिए और दूध की कीमतों पर सरकारी नियंत्रण लागू होना चाहिए। कई लोगों ने यह सुझाव भी दिया है कि नगर निगम, जिला प्रशासन या खाद्य सुरक्षा विभाग को मिलकर खुले दूध की गुणवत्ता की नियमित जांच करनी चाहिए और हर डेयरी को रेट लिस्ट सार्वजनिक करने का आदेश दिया जाना चाहिए।
क्या कहता है प्रशासन?
अब तक इस विषय पर प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। खाद्य विभाग और जिला आपूर्ति अधिकारी को इस बारे में पूछे जाने पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। वहीं, उपभोक्ता फोरम और नागरिक मंचों ने मांग की है कि प्रशासन इस विषय पर जांच कमेटी गठित करे और दूध विक्रेताओं पर नियमन लागू करे।
ऐसै हो सकता है समाधान
दूध की बिक्री को लाइसेंस और रेट लिस्ट से नियंत्रित किया जाए दूध की गुणवत्ता की नियमित जांच की जाए उपभोक्ताओं के लिए हेल्पलाइन नंबर और शिकायत पोर्टल बनाया जाए बड़ी ब्रांड कंपनियों को स्थानीय स्तर पर डिस्ट्रीब्यूशन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। जब एक ज़रूरी और रोज़मर्रा की वस्तु जैसे दूध तक पर इस तरह की मुनाफाखोरी और अनियंत्रित मूल्यवृद्धि हो रही हो, तो यह सि$र्फ महंगाई नहीं, बल्कि प्रशासनिक चूक और राजनीतिक उदासीनता का प्रतीक बन जाता है। अब जरूरत इस बात की है कि आम जनता संगठित होकर दूध माफिया के खिलाफ आवाज़ उठाए और प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर करे।
स्थानीय डेयरियों की मनमानी
शहर में सक्रिय स्थानीय डेयरियाँ, जैसे नरेंद्र डेयरी, महावीर डेयरी, और कुछ अन्य निजी डेयरी संचालक, खुले दूध की दरें बिना किसी नियंत्रण या सरकारी मूल्य निर्धारण के तय कर रहे हैं। न तो दूध की गुणवत्ता की नियमित जांच हो रही है और न ही रेट लिस्ट कहीं सार्वजनिक की जाती है। दूध विक्रेताओं का तर्क है कि चारे की महंगाई, ट्रांसपोर्ट और मजदूरी के बढ़ते खर्च की वजह से कीमतें बढ़ानी पड़ रही हैं। लेकिन उपभोक्ताओं का कहना है कि यह सीधी-सी बात मुनाफाखोरी और अवसरवादिता है। जनता नाराज़, प्रशासन मौन शहर के कई उपभोक्ताओं ने बताया कि वे रोज़मर्रा के खर्च से परेशान हैं। एक ओर महंगाई ने कमर तोड़ दी है, दूसरी ओर दूध जैसी जरूरी चीज़ भी अब लग्ज़री बनती जा रही है।







