मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने पेंशन विवाद पर सेवानिवृत्त प्रशिक्षण अधिकारियों की याचिका पर जारी किया नोटिस

जबलपुर: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में जस्टिस एम एस भट्टी के समक्ष तीन सेवानिवृत्त प्रशिक्षण अधिकारियों द्वारा दायर एक रिट याचिका पर राज्य सरकार और तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास विभाग को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ताओं ने सरकार के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें उनकी पेंशन और ग्रेच्युटी लाभों की गणना से उनकी अंतरिम सेवा के लंबे वर्षों को बाहर रखा गया है।
याचिकाकर्ता महेश कुमार सोलंकी, नियामत उल्ला कुरैशी और किशोर कुमार कनौजिया ने तर्क दिया कि यह कदम “विद्वेषपूर्ण भेदभाव” के समान है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समता के उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
केबिनेट फैसले पर विवाद
मामले की विशेष बात यह है कि याचिकाकर्ताओं ने सरकार की उस स्थिति पर सवाल उठाया है जिसमें एक ओर तो कनिष्ठ अधिकारियों को केबिनेट के फैसले के आधार पर अंतरिम सेवा की गणना कर पेंशन लाभ दिया गया, वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं द्वारा इसका लाभ मांगने पर अब कहा जा रहा है कि उन कनिष्ठ अधिकारियों को दिए गए लाभ की जांच की जाएगी। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सचिव स्तर का अधिकारी केबिनेट के फैसले पर प्रश्न नहीं उठा सकता, लेकिन अब वह इस फैसले पर पुनर्विचार की बातकर रहे हैं जो गलत है ।
एक दशक से अधिक की सेवा निरर्थक
याचिका के अनुसार, इन अधिकारियों की मूल नियुक्ति 1986-88 में भोपाल गैस त्रासदी के लिए पुनर्वास उपायों के तहत औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में अंतरिम आधार पर हुई थी। उन्होंने स्वीकृत पदों पर निरंतर सेवा दी और अंततः 1998-99 में उनका नियमितिकरण किया गया। हालांकि, 2019 और 2020 के बीच उनकी सेवानिवृत्ति पर, वित्त विभाग ने पेंशन के लिए उनकी अर्हकारी सेवा की गणना केवल उनके नियमितिकरण की तारीख से की, उनके एक दशक से अधिक के अंतरिम कार्यकाल को नजरअंदाज कर दिया।
जूनियर्स को मिला पूरा लाभ
जहाँ याचिकाकर्ताओं का 1998 में नियमितीकरण हुआ था, वहीं उनके जूनियर अधिकारियों का सेवानियमन बाद में 2008-13 में हुआ था, उन्हें पेंशन के लिए उनकी पूरी अंतरिम सेवा को गिनने का लाभ प्रदान किया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह व्यवहार ऐसा है जैसे उनके अपने समकक्षों की तुलना में पहले सेवानियमित होने के कारण उनके साथ ही दंडात्मक व्यवहार किया जा रहा है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रशांत अवस्थी, असीम त्रिवेदी, आनंद शुक्ला, और शुभम पाटकर ने पैरवी की।







