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होलिका दहन दो या तीन मार्च? जबलपुर में शास्त्र सम्मत तिथि पर होगा दहन, रंगोत्सव चार मार्च को ही

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होलिका दहन दो या तीन मार्च? जबलपुर में शास्त्र सम्मत तिथि पर होगा दहन, रंगोत्सव चार मार्च को ही

जबलपुर, यश भारत। यश भारत प्राइम टाइम में होलिका दहन और धूरेडी को लेकर उठे भ्रम पर विशेष चर्चा की गई। कार्यक्रम में आशीष शुक्ला से बातचीत में ज्योतिषाचार्य लोकेश व्यास ने स्पष्ट किया कि इस वर्ष तिथियों के विशेष संयोग के कारण होलिका दहन और रंगोत्सव की तिथि सामान्य वर्षों से अलग दिखाई दे रही है।
ज्योतिषाचार्य ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन हमेशा प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा में किया जाना चाहिए। इस वर्ष पूर्णिमा दो मार्च को शाम 5.57 बजे प्रारंभ होकर अगले दिन शाम 5.07 बजे समाप्त हो रही है। इसी पूर्णिमा में भद्रा का संयोग भी बन रहा है, जिसके कारण होलिका दहन केवल भद्रा के पुच्छ काल में ही शास्त्र सम्मत माना गया है।
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यश भारत प्राइम टाइम में ज्योतिषाचार्य लोकेश व्यास ने साफ किया भ्रम – भद्रा, चंद्रग्रहण और सूतक के कारण इस बार बदला पर्व क्रम
कार्यक्रम में बताया गया कि इस वर्ष तीन मार्च को चंद्रग्रहण भी पड़ रहा है, जिसके कारण शुभकार्य वर्जित रहते हैं और उससे पूर्व सूतक काल
लागू हो जाता है। इसी वजह से पूरे देश में होलिका दहन की तिथि को लेकर दो मत सामने आ रहे हैं। ज्योतिषाचार्य व्यास के अनुसार, शास्त्रीय

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ASHISH SHUKLA
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लिए शास्त्र सम्मत तिथि दो मार्च की रात, अर्धरात्रि के बाद मानी गई है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस वर्ष शुद्ध और निर्विवाद को ही पूरे देश में मनाया जाना चाहिए। कुछ रंगोत्सव, अर्थात धुरेडी या रंगों का पर्व, चार मार्च पंचांगों में तीन मार्च को धुरेडी लिखे जाने को उन्होंने तकनीकी त्रुटि बताया।
कार्यक्रम में यह भी स्पष्ट किया गया कि होलिका दहन के समय महिलाओं, पुरुषों और
व्यवस्था के तहत भारत के पूर्वी भागों में दो मार्च को तथा पश्चिमी राज्यों में तीन मार्च को होलिका दहन की स्थिति बन रही है। जबलपुर
बच्चों द्वारा परिक्रमा करना, नजर उतारना और राख घर ले जाना सूतक प्रारंभ होने से पहले किया जा सकता है। सूतक लगने के बाद किसी भी प्रकार के धार्मिक या शुभ कर्म नहीं करने की परंपरा है। ज्योतिषाचार्य ने प्रशासन से भी अपील की कि पर्व की संवेदनशीलता को देखते हुए सुरक्षा और कानून व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम दो मार्च से ही सुनिश्चित किए जाएं, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों में दहन की तिथि अलग हो सकती है।

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