Dial 112 – कप्तान का सटीक ‘मास्टर स्ट्रोक’ — बदली कमान, बदला संदेश

कप्तान का सटीक ‘मास्टर स्ट्रोक’ — बदली कमान, बदला संदेश

सिहोरा में तनाव की आहट हुई तो कप्तान ने देर नहीं की—सीधे क्राइम ब्रांच की महिला अधिकारी को कमान सौंप दी। थाना प्रभारी अवकाश पर थे और तीन वर्षों से वहीं जमे भी थे। ऐसे में यह बदलाव कई लोगों को “एक तीर से दो निशाने” जैसा लगा। महिला अधिकारी की सख्त कार्यशैली पहले से चर्चा में रही है। कप्तान की यह चाल मानो संदेश दे गई कि अब “ढाक के तीन पात” नहीं चलेंगे। जहाँ हालात बिगड़ें, वहाँ “लोहे को लोहे से काटने” की नीति अपनाई जाएगी।
कुछ लोग इसे ‘वूमेन कार्ड’ कह रहे हैं, तो कुछ इसे समय पर चली हुई सधी चाल। पर इतना तय है कि कप्तान ने “सोते को जगाने” का काम कर दिया है। अब देखना यह है कि यह मास्टर स्ट्रोक सिहोरा में स्थायी शांति लाता है या फिर प्रशासनिक बिसात पर नई चालों की जरूरत पड़ेगी।
बड़ी मशक्कत से पहुंचे स्थापना में मुकदमे का क्या होगा.. ?

स्थापना शाखा को यूँ ही दफ़्तर का “भाग्य-विधाता कक्ष” नहीं कहा जाता। यहाँ बैठने वाला बाबू कई कर्मचारियों की पोस्टिंग का पत्ता फेंटता है। किसे कहाँ जमाना है और किसकी कुर्सी खिसकानी है—यहाँ की मेज़ पर ही तय होता है।
इन्हीं महोदय पर तीन वर्ष पूर्व मारपीट का मुक़दमा दर्ज हुआ था। कुछ समय तक उनकी पोस्टिंग “आसमान से गिरे, खजूर में अटके” वाली स्थिति में रही, पर आखिरकार बड़ी मशक्कत से स्थापना की कुर्सी मिल ही गई। कहते हैं, “जाको राखे साइयां, मार सके न कोय”—फाइलें भी आखिर अपने ठिकाने तक पहुँच ही जाती हैं।अब दफ़्तर में कानाफूसी है। लोग मुस्कराकर पूछ रहे हैं—जो दूसरों की बदली “आँखों ही आँखों में” लिख देता है, क्या उसकी अपनी कुर्सी पर मुक़दमे की फाइल “साँप बनकर लोट” तो नहीं रही? कहीं ऐसा न हो कि “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” वाली स्थिति बन जाए और स्थापना की स्थिरता फिर से हिल जाए।व्यवस्था की विडंबना भी कम दिलचस्प नहीं। यहाँ वही हस्ताक्षर कई लोगों की दिशा बदलते हैं, और वही हस्ताक्षर कभी अपने ही भविष्य के आगे प्रश्नचिह्न बन सकते हैं। दफ़्तर की भाषा में कहें तो—फाइल चाहे कितनी भी दबा दी जाए, समय आने पर वह “राख में से चिंगारी” बनकर निकल ही आती है।फिलहाल स्थापना कक्ष में सब कुछ सामान्य है, पर गलियारों में मुस्कान लिए एक ही जुमला तैर रहा है—“कुर्सी बड़ी मुश्किल से मिली है, अब मुक़दमा कहीं खेल न बिगाड़ दे।”
पहले तो लोकेशनों का खेल था अब तो गोली चलना नाकार देते हैं

किसी जमाने में जब मोबाइल युग नहीं था तब थाना कप्तान अपने थाने में बैठकर पास के चौराहे तिराहे की लोकेशन देते थे बदली दुनिया में थाना कप्तान अपने थाने में गोली चलने की घटनाओं को भी नाकार देते हैं हाल ही में एक कुख्यात बस्ती में गोली चलने की घटना ने प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा ले ली। जब कप्तान ने संबंधित थाना कप्तान से जानकारी चाही, तो उत्तर मिला—“गोली चली ही नहीं, बस हल्की-फुल्की मारपीट हुई है।” मानो गोली नहीं, पटाखा भी नहीं, केवल ‘हवा’ चली हो!लेकिन तकनीक का अपना स्वभाव है—वह चुप नहीं रहती। तत्काल स्क्रीन पर वीडियो चलवाया गया। दृश्य स्पष्ट था—बदमाश बाकायदा गोली चलाते दिखाई दे रहे थे। अब शब्दों की ‘लोकेशन’ बदलने की गुंजाइश नहीं थी। परिणामस्वरूप थाना कप्तान को कड़ी फटकार मिली और गंभीर धाराओं में कार्रवाई के निर्देश दिए गए।घटना के बाद अधिकारियों के बीच हल्की-फुल्की चर्चा भी चली। कोई मुस्कराते हुए कह रहा था—“पहले तो लोकेशन में ही गड़बड़-घोटाला होता था, अब तो सीधे घटना ही गायब कर दी जाती है!”
फटकार से डगमगाई कुर्सी! अब आस्था का सहारा?

जिले के एक बड़े ग्रामीण थाने में क्राइम मीटिंग की कड़ी फटकार के बाद हलचल तेज़ हो गई है। लंबित प्रकरणों पर एसपी की स्पष्ट चेतावनी ने संकेत दे दिया कि “ज्यों की त्यों” स्थिति अब स्वीकार्य नहीं होगी।यह थाना हमेशा से अहम माना जाता रहा है, इसलिए कुर्सी पर कई निगाहें टिकी हैं। फटकार की खबर बाहर आते ही “लोहे को गरम देखकर हथौड़ा” चलाने की सुगबुगाहट भी बढ़ गई। लाइन में बैठे अधिकारी सक्रिय दिखने लगे, और हाल ही में लाइन पहुँची महिला थाना प्रभारियों के नाम भी चर्चा में हैं।इधर, पूर्व में यहाँ पदस्थ रह चुके कुछ अधिकारियों ने मौजूदा थाना प्रभारी को पास के प्रसिद्ध मां शेरावाली मंदिर में मत्था टेकने की सलाह दी है। कहा जाता है, वहाँ का आशीर्वाद कई “डगमगाती नैया” पार लगा चुका है।
अब देखना यह है कि कुर्सी को स्थिरता आँकड़ों से मिलेगी या आस्था से।







