
जय सिंह / यश भारत
गुजरात के अहमदाबाद में हुए विमान हादसे के बाद मृतकों की पहचान में आई कठिनाइयों ने आपदा प्रबंधन व्यवस्था को झकझोर दिया। इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने पहली बार बड़े हादसों और आपदाओं में मृतकों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी किए हैं। इनका उद्देश्य स्पष्ट है, कोई भी शव लावारिस न रहे और प्रत्येक मृतक को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई मिल सके।
एनडीएमए के अनुसार पहचान की प्रक्रिया चार चरणों में पूरी की जाएगी। पहले चरण में दुर्घटनास्थल से शव अथवा अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से संकलन और दस्तावेजीकरण किया जाएगा। दूसरे चरण में पोस्टमार्टम, फिंगरप्रिंट, डीएनए विश्लेषण, दंत परीक्षण (ओडोंटोलॉजी), वर्चुअल ऑटोप्सी और फॉरेंसिक एंथ्रोपोलॉजी जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग होगा। तीसरे चरण में परिजनों से स्वास्थ्य संबंधी अभिलेख, दंत रिकॉर्ड और डीएनए नमूने लिए जाएंगे। अंतिम चरण में सभी सूचनाओं का मिलान कर पहचान की पुष्टि की जाएगी और शव को सम्मानपूर्वक परिवार को सौंपा जाएगा।
इंटरपोल के अनुसार मृतकों की पहचान के तीन प्रमुख आधार हैं फिंगरप्रिंट, दंत परीक्षण और डीएनए विश्लेषण। आग, विस्फोट या भीषण दुर्घटनाओं में भी दांत सुरक्षित रह सकते हैं, इसलिए दंत अभिलेख निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर पर ‘डेंटल डेटा रजिस्ट्री’ की आवश्यकता पर बल दिया गया है। मोबाइल फोन से प्राप्त डिजिटल जानकारी भी पहचान में सहायक हो सकती है।
मुंबई जैसे महानगर में यह पहल विशेष महत्व रखती है। उपलब्ध रिपोर्टों और आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार मुंबई महानगरीय क्षेत्र में प्रति माह लगभग 300 शव विभिन्न कारणों से मिलते हैं, जिनमें से करीब 40 प्रतिशत की पहचान नहीं हो पाती। वार्षिक रूप से लगभग 1,400 से 1,500 शव अज्ञात या लावारिस रह जाते हैं। इनमें सड़क और रेल दुर्घटनाएँ, प्राकृतिक मृत्यु तथा बेघर व्यक्तियों के मामले शामिल हैं।







