36 वर्षों का इंतज़ार और सरकार की खामोशी—कश्मीरी पंडित न्याय से अब भी दूर: विवेक तन्खा
विस्थापितों के घाव अब भी हरे, न्याय की राह अधूरी

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राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने इस ज्वलंत विषय पर केंद्र सरकार के रवैये को निराशाजनक बताया है। उन्होंने कहा कि संवेदनशील मुद्दों पर सरकार की उदासीनता और नकारात्मक दृष्टिकोण ने कश्मीरी पंडितों की उम्मीदों को लगातार धक्का दिया है। उनका कहना है कि 36 वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे नागरिकों की पीड़ा को राजनीतिक सोच और इच्छाशक्ति की कमी ने और बढ़ाया है1990 के दशक में आतंक और भय के चलते कश्मीर घाटी छोड़ने को मजबूर हुए पंडित समुदाय अब भी सम्मानजनक वापसी, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों की प्रतीक्षा में है। इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है, जिससे समुदाय का दर्द और असंतोष और गहरा होता जा रहा है।
‘जस्टिस फॉर कश्मीरी पंडित’ बिल पर ठहराव
तन्खा ने अपने वीडियो संदेश में स्पष्ट किया कि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास, संपत्ति संरक्षण और अधिकारों को लेकर “जस्टिस फॉर कश्मीरी पंडित” नामक निजी विधेयक संसद में प्रस्तुत किया था। उनका आरोप है कि यदि सरकार चाहती तो यह बिल राज्यसभा की चर्चा सूची में आ सकता था, परंतु इरादे और पहल की कमी ने इसे आगे नहीं बढ़ने दिया। यह विधेयक कश्मीरी पंडितों के भविष्य को लेकर एक ठोस समाधान का प्रारूप हो सकता था।
इरादे की कमी बनी सबसे बड़ी बाधा
तन्खा ने दो टूक कहा कि यह समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि सरकार की मंशा की है। उन्होंने दावा किया कि “न्याय का रास्ता कानून से होकर जाता है, और यदि सत्ता इच्छुक होती, तो यह बिल कश्मीरी पंडितों की पीड़ा का अंत शुरू कर सकता था।” लेकिन राजनीतिक संकल्प की कमी ने इस ऐतिहासिक अवसर को अधर में छोड़ दिया।
आस्था से जोड़ी उम्मीद की डोर
अपने संदेश के अंत में तनखा भावुक दिसे और उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों के संघर्ष में माँ शारदा, माँ राज्ञा और माँ शारिका सदैव साथ हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि आस्था, न्याय और संघर्ष की यह यात्रा व्यर्थ नहीं जाएगी और सत्य को एक दिन अपने आप मार्ग मिलेगा। उनका यह धार्मिक आह्वान समुदाय के भीतर नई ऊर्जा और विश्वास का संचार करता है।
सोशल मीडिया पर तेज़ हुई बहस
तन्खा के बयान के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है। बड़ी संख्या में लोग सरकार से यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास, सुरक्षा और सम्मान जैसे मुद्दों पर ठोस निर्णय कब लिया जाएगा। यह बयान केवल एक ट्वीट नहीं, बल्कि उन लाखों विस्थापित परिवारों की आवाज प्रतीत हो रहा है, जो आज भी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं।
अंत में बड़ा सवाल—न्याय कब?
तन्खा के इस बयान ने बहस को फिर जीवंत कर दिया है। लेकिन सच्चाई यह है कि कश्मीरी पंडित अब भी समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सवाल सिर्फ इतना है—क्या इस देश की संसद कभी उनके घावों पर मरहम लगाएगी, या फिर यह संघर्ष और लंबा होने वाला है?







