
26/11 मुंबई हमला, देश को झकझोर देने वाली रात की यादें आज भी ताज़ा
लेखक – आकाश पाण्डेय
मुंबई। 26/11 का आतंकवादी हमला भारतीय इतिहास की उन त्रासदी घटनाओं में से एक है, जिसने न सिर्फ देश की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि आम नागरिकों के दिलों पर गहरे जख्म छोड़ दिए। आज हमले को 17 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उस रात का दर्द, दहशत, बहादुरी और त्याग आज भी उतनी ही तीव्रता से महसूस होता है। समुद्री रास्ते से आए दस आतंकवादियों ने ताज होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट, सीएसटी स्टेशन, नरीमन हाउस और लीओपोल्ड कैफ़े जैसे व्यस्त स्थानों पर अंधाधुंध हमले किए, जिससे मुंबई 60 घंटे तक दहशत के साये में घिरी रही।

ताज और ओबेरॉय में दहशत
हमलों की सबसे भयावह तस्वीरें ताज होटल से आई, जहाँ आतंकी मंजिल दर मंजिल आग लगाते और फायरिंग करते आगे बढ़ रहे थे। इस भयावह माहौल में होटल के कर्मचारियों ने मेहमानों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना रात भर साहस दिखाया। कई कर्मचारियों ने खुद गोली खाकर भी मेहमानों को बचाया, उनकी कर्तव्यपरायणता आज भी दुनिया में मिसाल मानी जाती है। ओबेरॉय ट्राइडेंट होटल में भी इसी तरह की वीरता देखने को मिली। सुरक्षा बलों की कमांडो टीमों ने होटल के हर कॉरिडोर, हर कमरे की सर्च करते हुए आतंकियों को ढेर किया।

सीएसटी स्टेशन, जहां आतंक के सामने खड़ा था एक निहत्या सिपाही
मुंबई का व्यस्ततम छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) स्टेशन उस रात खून और गोलियों की बारिश से थर्रा उठा। आतंकियों ने प्लेटफॉर्म पर मौजूद यात्रियों पर अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें कई मासूमों ने मौके पर ही दम तोड दिया। इसी अफरातफरी के बीच कॉन्स्टेबल तुकाराम ओबले ने बिना हथियार के आतंकवादी – अजमल कसाब को पकड़ने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी। उन्होंने कसाब की बंदूक पकड़कर उसे आगे बढ़ने से – रोका, और इस दौरान खुद गोलियों से छलनी हो गए। उनकी वीरता ने पूरे हमले की दिशा बदल दी और भारत के हाथ एक जिंदा आतंकी लगा, जिसके बयान ने पूरी साजिश को दुनिया के सामने ला दिया।

कमान्डो ऑपरेशन, हर कदम पर मौत का खतरा, पर हिम्मत न टूटी
हमले के शुरुआती घंटों में एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, एसीपी अशोक काम्टे और वरिष्ठ अधिकारी विजय सालस्कर आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए। इनकी शहादत ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। इसके बाद ऑपरेशन की कमान हस्त्र कमांडो और रू ष्टहर ने संभाली। कमांडो ताज, ओबेरॉय और नरीमन हाउस में घुसे, जहाँ धुआँ, आग, विस्फोट और गोलियों की आवाजें लगातार गूंज रही थीं। हर कमरे में छिपे संभावित खतरे, हर मोड पर मौत का सामना, लेकिन कमांडो एक-एक कदम बढ़ते गए। नरीमन हाउस में फंसे लोगों को बचाने की कोशिश में कई घंटे तक लगातार गोलीबारी हुई। अंततः सभी आतंकियों का सफाया कर दिया गया।

अस्पतालों में रात भर चले जीवन बचाने के प्रयास
हमले के दौरान घायल लोगों को बड़ी संख्या में अस्पतालों में लाया जा रहा था। डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ ने घंटों तक लगातार ऑपरेशन, उपचार और ब्लड ट्रांसफर किए। कई मेडिकल स्टाफ ने 24 घंटे से ज्यादा बिना आराम किए काम किया, ताकि अधिक से अधिक लोगों की जान बचाई जा सके।
166 मौतें, सैकड़ों घायल, और उससे भी गहरा घाव समाज के दिल में
26/11 में 166 लोगों की जान गई और 300 से अधिक घायल हुए। कई परिवार बिखर गए, कई बच्चे अनाथ हुए और कई लोग हमेशा के लिए शारीरिक व मानसिक पीड़ा के साथ जीने को मजबूर हो गए। यह हमला सिर्फ मुंबई पर नहीं, बल्कि पूरे भारत की सामूहिक चेतना पर एक गहरी चोट था। लेकिन इस त्रासदी के बाद मुंबई ने एक बार फिर साबित किया कि वह मुश्किलों के सामने झुकती नहीं है। डर और दहशत के बीच भी ‘स्पिरिट ऑफ मुंबई’ कायम रही लोगों ने एक-दूसरे की मदद की, रक्तदान किया, घायलों को अस्पताल पहुँचाया और शहर को फिर से पटरी पर लाने में

योगदान दिया। 26/11 केवल एक हमला नहीं, बल्कि एक सीख-यह रात
भारत को कई सबक देकर गई सुरक्षा में सुधार, तटीय निगरानी बढ़ाने, आतंकवाद के खिलाफ सख्त रणनीति और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्व्य की आवश्यकता। तब से लेकर आज तक देश की सुरक्षा व्यवस्था में कई बड़े परिवर्तन किए गए हैं। 17 वर्ष बाद भी 26/11 का जिक्र होते ही लोग सिहर उठते हैं। लेकिन साथ ही वे उन बहादुर नागरिकों, पुलिसकर्मियों, कमांडो और डॉक्टरों को याद करते हैं, जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए दूसरों की जान बचाने के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। 26/11 सिर्फ एक हमला नहीं था यह भारत की एकजुटता, साहस और मानवता की सबसे बड़ी परीक्षा थी, जिसे देश ने मजबूती से पार किया।







