सरकारी रिकार्ड में दर्ज नहीं होने वाली संपत्तियों को टैक्स के दायरे में लाने की तैयारी
- नगरीय निकाय का अमला करेगा भौतिक आंकलन, निकायों की कमाई बढ़ेगी

सरकारी रिकार्ड में दर्ज नहीं होने वाली संपत्तियों को टैक्स के दायरे में लाने की तैयारी
– नगरीय निकाय का अमला करेगा भौतिक आंकलन, निकायों की कमाई बढ़ेगी
– सर्वे के प्रारम्भिक चरण में ही रसूखदारों ने मचाया हंगामा, इंदौर के वार्ड-74 से निकला 50 करोड़ अनुमानित टैक्स
आशीष दीक्षित, भोपाल। प्रदेश की नगरीय निकायों की खराब माली हालत सुधारने के लिए नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। प्रदेश भर में नगर निगमों और पालिकाओं में संपत्तियों का भौतिक आंकलन और जीआईएस आधारित सर्वे शुरू कराया गया है। इससे न केवल पहले से दर्ज प्रॉपर्टियों का डिजिटल आंकलन किया जाएगा, बल्कि जमीनी स्तर पर मौजूद लेकिन रिकॉर्ड में नहीं आने वाली संपत्तियों को भी टैक्स दायरे में लाया जाएगा। यह पहल निकायों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
23 सितंबर की बैठक से निकला ‘आत्मनिर्भर निकाय’ का रोडमैप
नगरीय प्रशासन विभाग की 23 सितंबर 2025 को भोपाल में हुई प्रदेश स्तरीय बैठक इस फैसले की नींव बनी। इस बैठक में प्रदेश के 16 निकायों के महापौर शामिल हुए थे। बैठक में खासतौर पर इस बात पर जोर दिया गया कि प्रदेश के नगरीय निकाय छोटे-छोटे राजस्व स्रोतों को केवल “आय का साधन” मानने के बजाय उन्हें “आत्मनिर्भरता का आधार” बनाएं।
बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, राज्य के कई निकायों में अघोषित व अदर्ज संपत्तियों की संख्या सामने आई। इन्होंने राजस्व प्रणाली को खोखला किया है और टैक्स बेस सीमित कर दिया है। इसी संदर्भ में भौतिक आंकलन और जीआईएस आधारित सर्वे को तेजी से लागू करने का निर्णय लिया गया।
नजर में नहीं आती ये संपत्तियां
जीआईएस रिपोर्ट सेटेलाइट के माध्यम से तैयार होती है, लेकिन कई कवर किए गए शेड, बाउंड्री वॉल के अंदर बने अतिरिक्त निर्माण, एवं ऊँचाई/आकार में हुए परिवर्तन पहले दर्ज रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते। इसलिए इसके पूरक के रूप में मैदानी अमले द्वारा भौतिक सत्यापन का निर्णय लिया गया।
इंदौर बना पहला मॉडल, लेकिन शुरुआत में ही विवाद
योजनाबद्ध तरीके से इस अभियान की शुरुआत सबसे पहले इंदौर नगर निगम ने की। निगम ने भंवरकुआं क्षेत्र के वार्ड 74 को पायलट क्षेत्र के रूप में चुना। जैसे ही अमला मौके पर उतरा, चौंकाने वाली जानकारियां सामने आने लगीं।
* कई संपत्तियों का वर्षों से टैक्स जमा नहीं हुआ था
* कुछ निर्माण रिकॉर्ड में पूरी तरह दर्ज ही नहीं थे
* आधिकारिक रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में किलोमीटर का अंतर सामने आया
प्रारंभिक सर्वे के बाद निगम अधिकारियों का आकलन है कि सिर्फ वार्ड 74 से ही करीब 50 करोड़ रुपये का संपत्ति कर वसूला जाना बाकी है। यही संभावनाएं देखकर निगम ने रिपोर्ट तैयार करने और वसूली प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
स्थानीय दबाव सामने आया, पुलिस तक पहुंचा मामला
निगम कर्मियों की कार्रवाई कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों को रास नहीं आई। सर्वे रोकने की मांग करते हुए मौके पर हंगामा खड़ा किया गया। परिस्थिति तब इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को बीच में आना पड़ा और अमले की सुरक्षा सुनिश्चित करनी पड़ी।
सूत्र बताते हैं कि कई संपत्तियां राजनीतिक छत्रछाया में वर्षों से टैक्स मुक्त बनी हुई थीं। ऐसे में सर्वे के जरिए इन संपत्तियों को टैक्स नेट में लाना कुछ लोगों के हितों से टकरा रहा है। यही वजह है कि कार्रवाई पर राजनीतिक दबाव बढ़ते ही अभियान की रफ्तार धीमी हो गई है।
सरकार का इरादा साफ, निकायों की आय बढ़ाने पर फोकस
नगरीय प्रशासन विभाग का कहना है कि यदि यह अभियान प्रदेश में योजना बद्ध तरीके से चलता रहा तो आने वाले वर्षों में निकायों की आय में हजारों करोड़ की बढ़ोतरी संभव है। जीआईएस सर्वे की विशेषता यह है कि यह डिजिटल और साक्ष्य आधारित है, जिसे आसानी से नकारा नहीं जा सकता। वहीं भौतिक सत्यापन इसे और मजबूत आधार देता है।
एक्सपर्ट व्यू
पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष अखिलेश खंडेलवाल का कहना है कि सरकार इस पहल को टैक्स वसूली नहीं बल्कि राज्य की वित्तीय क्षमता और शहरी विकास में पुनर्निवेश की दृष्टि से देख रही है। परंतु विपक्ष और प्रभावशाली स्थानीय समूह विरोध कर रहे हैं।







