जबलपुरमध्य प्रदेश

75 का पौआ 90 का और 90 वाला हो गया 110 का

जबलपुर यश भारत। शहर में एक बार फिर एमआरपी से ज्यादा रेट पर शराब बिक्री को लेकर न केवल चर्चाएं सर्गरम में है बल्कि शराब का शौक रखने वाली भी परेशान नजर आ रहे है। सबसे ज्यादा परेशान है देसी शराब पीने वाले कुछ दिन पहले तक जो पाव 70,75 रुपये में मिल जाता था उसके दाम बढ़ाकर 90 रुपये कर दिए गए और मसाला का जो पाव 90 का मिलता था वह अब 110 रुपए में मिल रहा है। देसी शराब पीने वालों में ज्यादातर संख्या गरीब मजदूर या आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की रहती है ऐसे में उनके लिए तो एक पौआ मैं 20 रुपये की बढ़ोतरी बड़ी बात हो जाती है। ऐसा नहीं है कि शराब के दाम केवल देसी में बढे है अंग्रेजी शराब के दामों में भी बढ़ोतरी हुई है लेकिन अंग्रेजी शराब के दामों में ज्यादा बढ़ोतरी करने से हो हल्ला काफी मचाने लगता है और इसके पीछे मुख्य वजह है अंग्रेजी शराब का शौक रखने वालों का समझदार हो पढ़ा लिखा होना दाम बढ़ते ही वे शराब दुकान के कर्मचारियों से तरह-तरह के सवाल जवाब करने लगते हैं कोई एमआरपी की बात करता है तो कोई रेट लिस्ट की जबकि देसी शराब के मामले में इससे स्थिति बिल्कुल विपरीत है। वहां तो गरीब गुरवा शराब पीने जाते हैं उन्हें इतना भी नहीं मालूम कि क्या एमआरपी होती है और कितने की मिलनी चाहिए उन्हें तो दुकानदार जितने की टिका देता है मजबूरी में वै उतने पैसे देकर शराब खरीदने के लिए विवश है और यदि सही कहा जाए तो दाम बढ़ने का असर सबसे ज्यादा आर्थिक रूप से कमजोर इन्हीं लोगों पर भी पड़ता है। साधन संपन्न का क्या।

 अब यह किस सिस्टम के तहत हो रहा है

 अब एक बार फिर जब शराब दुकानों में एमआरपी रेट से ज्यादा में शराब बिकने के समाचार सामने आने लगे हैं तो यहां यह सवाल उठना भी लाजिमी हो जाता है कि आखिर यह किस सिस्टम का हिस्सा है। क्योंकि महंगी शराब को लेकर जब पूर्व में काफी हो हल्ला मचा तो खुद कलेक्टर साहब को सामने आकर गोपनीय तरीके से स्टिंग ऑपरेशन करने की जरूरत पड़ गई थी। इतना ही नहीं महंगी शराब का मामला तो हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है। और न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब भी किया है। हाल ही में चल रही विधानसभा के दौरान भी नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने प्रदेश में में बिकने वाली महंगी शराब का मुद्दा उठाया है। बावजूद इसके ना तो कोई असर आबकारी विभाग के आलाअफसरों पर पड रहा है और ना उन्हें किसी की परवाह है। दबी जवान से कुछ लोग तो यह भी चर्चा कर रहे हैं कि यह सारा खेल विभाग के मुखिया के इशारे पर ही चल रहा है।

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