सतना।मैहर वनपरिक्षेत्र अंतर्गत भदनपुर बीट की वनभूमि पर कथित अतिक्रमण को लेकर अल्ट्राटेक सीमेंट फैक्ट्री लिमिटेड एक बार फिर चर्चा में है। कंपनी को वर्ष 1990 में 193 हेक्टेयर वनभूमि लीज पर आवंटित की गई थी, लेकिन आरोप है कि फैक्ट्री प्रबंधन ने 216.5 हेक्टेयर क्षेत्र में निर्माण कार्य करा लिया। इस प्रकार लगभग 23.5 से 27.9 हेक्टेयर अतिरिक्त वनभूमि पर अवैध कब्जे का मामला सामने आया है।
करीब 18 वर्षों तक यह मामला फाइलों में दबा रहा। वर्ष 2020-21 में वन विभाग ने संज्ञान लेते हुए भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 33 के तहत वन अपराध दर्ज किया। तत्कालीन मैहर उपवनमंडल अधिकारी यशपाल मेहरा और वन परिक्षेत्र अधिकारी सतीशचंद्र मिश्रा ने कार्रवाई प्रारंभ की, हालांकि कार्रवाई के दूसरे ही दिन दोनों अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। बाद में उन्हें हाईकोर्ट से राहत मिली।
गूगल मैपिंग से प्रमाणित हुआ अतिक्रमण
वन विभाग द्वारा 8 अप्रैल 2024 को राज्य शासन को पत्र क्रमांक 3029 के माध्यम से गूगल मैपिंग रिपोर्ट भेजी गई, जिसमें वनभूमि पर अतिक्रमण की पुष्टि की गई। रिपोर्ट के अनुसार करीब पांच हेक्टेयर भूमि पर वन एवं राजस्व विभाग के बीच दावा भी विवादित है।
मऊगंज में 23.5 हेक्टेयर भूमि देने का प्रस्ताव
मामले को सुलझाने के लिए कंपनी ने फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट (एफसीए) के तहत मऊगंज वनमंडल में 23.5 हेक्टेयर भूमि प्रतिपूरक पौधारोपण हेतु देने का प्रस्ताव रखा है। हालांकि यह प्रस्ताव अभी केंद्र सरकार की स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। स्वीकृति मिलने के बाद कंपनी को प्रस्तावित भूमि पर पौधारोपण कर वन विकसित करना होगा और अतिक्रमण के एवज में निर्धारित पेनाल्टी राशि भी जमा करनी होगी।
वन विभाग को जमीन की स्पष्ट जानकारी नहीं
सूत्रों के अनुसार, आवेदन प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद वन विभाग को अब तक यह स्पष्ट जानकारी नहीं है कि प्रस्तावित भूमि का वास्तविक स्थान और सीमांकन क्या है।
डीएफओ मऊगंज वनमंडल लोकेश नरपुरे के अनुसार, कंपनी ने एफसीए के तहत भूमि देने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया है, परंतु उसकी वास्तविक माप और स्थल की पुष्टि शेष है। वहीं डीएफओ मैहर वनमंडल विद्याशंकर शुक्ला ने कहा कि जमीन और जुर्माने का निर्धारण शासन स्तर पर किया जाएगा।
वनभूमि पर बने विद्यालय, अस्पताल और कॉलोनी
बताया जाता है कि अतिरिक्त वनभूमि पर कंपनी द्वारा विद्यालय, अस्पताल, आवासीय कॉलोनी, बाजार, मैदान और महाविद्यालय सहित कई स्थायी निर्माण कराए गए हैं। इतने वर्षों तक वनभूमि पर कब्जा बनाए रखने के कारण अब कंपनी को करोड़ों रुपये बतौर जुर्माना अदा करना पड़ सकता है, जिसकी राशि का निर्धारण शासन स्तर पर होना है।
अब सबकी निगाहें केंद्र सरकार की स्वीकृति और शासन द्वारा तय किए जाने वाले जुर्माने पर टिकी हैं। यह मामला न केवल वन संरक्षण कानूनों की प्रभावशीलता पर प्रश्न खड़े करता है, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई की पारदर्शिता पर भी बहस छेड़ रहा है।
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