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मनीषा बच्चे को दुलार करके निकली थी बैंक, सोमवार को सड़क दुर्घटना में मौत

टक टकी आँखो से मां का इंतजार,अथर्व के सिर से उठा माँ का आँचल

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जबलपुर, यश भारत। बेटे के को खाना खिलाकर, दुलार करके, माथा चूमकर ड्यूटी गई मनीषा के परिजनों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि मनीषा अपने बेटे का अंतिम दुलार कर रही है,बेटा अथर्व जो अभी 2 साल का भी नहीं हुआ था रोजाना की तरह शाम को मां का इंतजार करता था जब वो आ जाती थी तो उसके हाथों से चाय-पीता, खाना खाता और रात में मां की बांहों में सिर रखकर आराम से गहरी नींद में सो जाता था लेकिन महज 2 साल की उम्र में ही मां का साया सिर से जुदा हो जाएगा और मां के आंचल का सुख कुछ दिन ही मिलेगा उसने कभी इसकी कल्पना नहीं की थी, एक कोने में बैठे मनीषा के  पति जो उससे बेहद प्यार करता था दूसरी तरफ परिवार के वे सदस्य जो मनीषा को सबसे होनहार, काबिल बेटी मानते थे उसकी अचानक असमय मौत पर पूरी तरह से टूटे हुए नजर आ रहे हैं अब बेटा अथर्व माँ -माँ कहते अपनी नन्ही आंखों से मां का रास्ता देख रहा है की कब वो अथर्व के पास आएंगे और उसे  अपने आंचल में सुलायेंगे

बीते दिनों हुए इस दर्दनाक एक्सीडेंट में मनीषा की जान चली गई, लेकिन उनके परिवार का दावा है कि इसके पीछे बैंक की प्रताड़ना और दबाव बड़ा कारण है। उनके पति राहुल कुमार पटेल और देवर ने सीधे तौर पर उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक, गौर ब्रांच को जिम्मेदार ठहराया है। परिजनों का कहना है कि मनीषा ऑपरेशन पोस्ट पर थीं, लेकिन बैंक उन्हें जबरन फील्ड वर्क के लिए भेजता था। जब उन्होंने इस पर आपत्ति जताई, तो उन्हें रिजाइन देने के लिए मजबूर किया गया। हालात ऐसे बन गए कि उन्होंने दिसंबर में इस्तीफा दे दिया, लेकिन फिर दोबारा बैंक को जॉइन करना पड़ा।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पहली बार नहीं था जब मनीषा का एक्सीडेंट हुआ हो। परिजनों को अब पता चला है कि दो महीने पहले भी बैंक के काम के दौरान एक हादसा हुआ था, जिसमें मनीषा के हाथ में चोट आई थी। उस वक्त भी बैंक में तनावपूर्ण माहौल बना था और लड़ाई-झगड़े की नौबत आई थी।

अब कौन संभालेगा मासूम अथर्व को

मनीषा की शादी को अभी तीन साल भी पूरे नहीं हुए थे, और उनके दो साल के बेटे अथर्व की दुनिया अब सूनी हो गई है। पिता राहुल पटेल ने भावुक होते हुए कहा, अब इस मासूम को हम कैसे संभालेंगे उसकी मां तो चली गई, लेकिन बैंक वाले सिर्फ दिलासा देकर चले गए। अभी तक किसी ने भी ठोस मदद की पेशकश नहीं की। मनीषा इससे पहले पाटन बैंक और पनागर ब्रांच में भी काम कर चुकी थीं। लेकिन उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक उनकी ज़िंदगी का आखिरी ठिकाना बन गया।

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