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17 देशों में बढ़ते संक्रमण पर भारतीय वैरिएंट की भूमिका, क्या है वैरिएंट?

नई दिल्ली। दुनियाभर में फैल चुके कोरोना महामारी का प्रकोप दक्षिण एशिया के देशों में भी भयंकर रूप से देखने को मिल रहा है। भारत में पहली बार पाया गया क्च.१.६१७ नाम का कोरोना वायरस वैरिएंट दक्षिण एशिया के 17 देशों में भी मिल चुका है। ऐसे में यह चर्चा उठी है कि दक्षिण एशियाई देशों में फैले कोरोना वायरस का यह वैरिएंट कहीं भारत से तो नहीं पहुंचा। फिलहाल वैज्ञानिक अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं। इधर, भारत ने दुनियाभर के मुकाबले इस माह कोरोना वायरस के सबसे अधिक मामले दर्ज किए हैं। इन केस लोड के कारण देश की राजनीतिक और वित्तीय राजधानियां नई दिल्ली और मुंबई में अस्पताल के बेड, मेडिकल ऑक्सीजन और दवाओं की भारी कमी से जूझ रही हैं। ऐसे में शोधकर्ता यह पता लगाने में जुट गए हैं कि आखिर कोरोना वायरस के मामलों में ये अप्रत्याशित उछाल क्यों आया, और क्या भारत में पहली बार मिलने वाले कोरोना वायरस के विशेष वैरिएंट को इसके लिए दोषी माना जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर भारत में मिले कोरोना वायरस वैरिएंट को लेकर चिंता बनी हुई है।
क्या है क्च.१.६१७ वैरिएंट?
वरिष्ठ भारतीय वायरोलॉजिस्ट शाहिद जमील ने कहा कि क्च.1.617 वैरिएंट में वायरस के दो प्रमुख म्यूटेशन हैं जो मानव कोशिकाओं से जुड़ते हैं। डब्ल्यूएचओ ने भी कहा कि क्च.1.617 वैरिएंट में ऐसे म्युटेंट हैं जो वायरस को अधिक संक्रामक बनाते हैं और जो वैक्सीन की प्रतिरक्षा से भी बच सकते हैं। सार्स-सीओवी-2 का क्च.1.617 वैरिएंट, जिसे डबल म्यूटेंट या इंडियन स्ट्रेन भी कहा जाता है, महाराष्ट्र और दिल्ली में बड़े पैमाने पर मिला है। इसकी वजह से यहां आई महामारी की दूसरी लहर ने बुरी तरह प्रभावित किया है। देश के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र के कई शहरों में जीनोम सिक्वेसिंग किए गए आधे से ज्यादा सैंपल में क्च.1.617 वैरिएंट मिला है। वहीं, मार्च के दूसरे सप्ताह में यूनाइटेड किंगडम वैरिएंट की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत थी। बी1.617 के प्रमुख वंश को पहली बार भारत में दिसंबर में पहचाना गया था। हालांकि, इसके पुराने वैरिएंट को अक्टूबर 2020 में पाया गया था।

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