दूध उपभोक्ताओं से ज्यादा जागरूक तो शराब उपभोक्ता
महंगे दूध पर कोई आवाज उठाने तैयार नहीं

जबलपुर यश भारत। पिछले 22 दिनों से दूध माफिया ने दूध के दाम बढ़ा रखे हैं लेकिन आश्चर्य की बात है की महंगे दूध को लेकर ना तो अब तक प्रशासन के द्वारा कोई कार्यवाही सुनिश्चित की गई और ना ही कोई जनप्रतिनिधि आम जनता से जुड़े इस जरुरी मुद्दे पर मोन तोड़ने तैयार नजर आ रहा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो जनप्रतिनिधियों और प्रशासन ने दूध माफिया के आगे घुटने टेक दिए हैं और वह बेखौफ होकर पूरे प्रदेश से महंगा दूध शहर में बेच रहे हैं। ऐसे में दूध उपभोक्ताओं को भी शराब के शौकीनों की तरह कुछ करना पड़ेगा। गत दिवस ही एक शराब उपभोक्ता ने शराब दुकान के कर्मचारी द्वारा महंगी शराब बेची जाने का न केवल विरोध किया बल्कि बाकायदा एक वीडियो बनाकर वायरल भी कर दिया। वीडियो इतनी तेजी से वायरल हुआ कि आनन-फानन में आबकारी विभाग को कार्यवाही के लिए विवश होना पड़ गया। न केवल शराब दुकान की उस कर्मचारी को हटवा दिया गया बल्कि विभाग से जुड़ी जिस महिला अधिकारी का नाम लेकर शराब दुकान कर्मचारी धौंस दिख रहा था उन माननीय मैडम पर भी प्रभारमुक्त करने की कार्यवाही की गई। इस पूरी प्रक्रिया से दूध उपभोक्ताओं को भी कुछ सीखना चाहिए प्रशासन और नेताओं के भरोसे कुछ होने जाने वाला नहीं है। दूधियों के खिलाफ खुद सड़क पर उतरो उनकी मनमानी के वीडियो बनाओ और इतना वायरल कर दो की प्रशासन को कदम उठाने मजबूर होना पड़े। वरना डेरी माफिया तोअपनी मनमानी कर ही रहे हैं।
शराब की तरह दूध की एमआरपी और एमएसपी तय कर देनी चाहिए
हर वर्ष डेरी संचालकों के द्वारा दामों में बढ़ोतरी से लोगों को जूझना पड़ता है। पूर्व वर्षों में देखा गया है कि अक्सर गर्मी के दिनों में जब दूध की खपत बढ़ती है तब दाम बढ़ाये जाते रहे हैं। लेकिन इस बार तो हद ही हो गई भरी बरसात में और त्यौहार के मौके पर दूध के दामों में तीन से पांच रुपए तक की बढ़ोतरी कर दी गई और इसे 22 दिन बीत चुके हैं। कुछ संगठनों ने जरूर कलेक्टर साहब से मिलकर आम आदमी की इस पीड़ा को उन तक पहुंचाया लेकिन कार्यवाही के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ और आज भी बाकायदा 75 से ₹80 लीटर तक दूध बिक रहा है और लोगों का बजट बिगड़ रहा है। आम लोगों का मानना है कि प्रशासन के लचर रवैया के कारण दूध माफिया को खुली छूट मिल चुकी है। जिसके चलते जब मन होता है दूध के दाम बढ़ा दिए जाते हैं। ऐसे में लोगों का कहना है कि जब शराब जैसी वस्तु की एसपी और एमआरपी तय है तो प्रशासन को चाहिए की कुछ इसी तरह की व्यवस्था दूध के मामले में भी कर दे।राजनीतिक गठबंधन भी बड़ी वजह
हम लोगों का तो यहां तक कहना है कि दूध माफिया किसी न किसी रूप में राजनीतिक दलों के प्रभावशाली लोगों से जुड़ा हुआ है और उन्हीं की मिलीभगत के कारण उनके हौसले बुलंद हैं वरना क्या वजह है कि आम आदमी की मूलभूत आवश्यकता को लेकर राजनीतिक दल और उसके प्रतिनिधि मौन धारण किए हैं।







