जबलपुर के पोलीपाथर में विराजे है 16 भुजाओं वाले गणपति
बादशाह हलवाई मंदिर जहां रिद्धि सिद्धि के साथ विराजे हैं

राजेश शर्मा राजू
जबलपुर यश भारत। संस्कारधानी में इन दिनों 10 दिवसीय गणेश उत्सव पर्व की छटा बिखरी है। गणपति के भक्त घरों से लेकर मंदिरों तक में विशेष पूजन अर्चन और आराधना में लगे है। चारों तरफ भक्ति का माहौल है। वैसे तो शहर में अनेक गणेश मंदिर है लेकिन इनमें से आज हम एक ऐसे मंदिर की बात कर रहे हैं जो ऐतिहासिक महत्व का तो है ही साथ ही इस मंदिर में भगवान गणेश की 16 भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित है शायद यह शहर का एकमात्र ऐसा मंदिर होगा जहां पर गजानंद रिद्धि सिद्धि के साथ विराजित हैं। शहर से 5 किलोमीटर दूर गौरीघाट मार्ग पर एक टीलेनुमा पहाड़ी पर स्थित यह प्राचीन मंदिर वैसे तो पंचानन महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। जहां पर 10 भुजी बजे पंचानन शिव उमा के साथ विराजमान है। लेकिन इसी मंदिर परिसर में 16 भुजाओं वाली गणेश प्रतिमा भी स्थापित है।
17 वी 18 वीं शताब्दी का बताया जाता है मंदिर
पहाड़ीनुमा टीले पर स्थित यह प्राचीन मंदिर 17वीं 18वीं शताब्दी का बताया जाता है। पुरातत्व महत्व के साथ ही आस्था का बड़ा केंद्र भी है। वैसे तो इस मंदिर की गर्भ ग्रह में 10 भुजी शिव और उमा की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में शिवलिंग के अलावा पद पीठ पर शिव और देवी के वहां नंदी और सिंह अंकित है। इसके अलावा भगवान गणेश शेषनाग सूर्य गरुणासीनलक्ष्मी नारायण और भैरव नर्मदा दुर्गा अन्नपूर्णा कीर्ति मुक्ति आदि की मूर्तियां भी स्थापित है। जिसमें कलचुरीकालीन मूर्तियों का भी समावेश है। यह प्राचीन मंदिर 30 स्तंभों पर आधारित है और सभी स्तंभों पर प्रतिमाओं का अंकन है। यह जानकारी मंदिर परिसर में लगे पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्राहलय के द्वारा लगाये गए शिला लेख पर अंकित है लेकिन यह शिलालेख इतना पुराना हो चुका है कि इसमें लिखे शब्दों को व मुश्किल पढ़ा जा सकता है।
इसलिए पड़ा है बादशाह हलवाई मंदिर नाम
इस मंदिर का नाम बादशाह हलवाई कैसे पड़ा उसके पीछे भी एक कहानी है मान्यता है कि उत्तर प्रदेश के रहने वाला एक हलवाई जो मिठाई बनाने का काम करता था उसका नाम बादशाह था और उसी ने इस मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए आर्थिक सहयोग किया था इसलिए तब से लोग इस मंदिर को बादशाह हलवाई मंदिर के नाम से संबोधित करने लगे। यह मंदिर पुरातात्विक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण विरासत है क्योंकि इसमें पाई गई प्रतिमाएं कलचुरी राजवंश के जमाने की प्रतीत होती हैं। कुछ लोग इस मंदिर को 11वीं 12वीं शताब्दी का भी बताते हैं। गौर तलब है कि जबलपुर के तेवर के आसपास तत्कालीन समय में कल्चर शासन रहने का इतिहास भी है जिससे स्पष्ट होता है कि यह मंदिर कलचुरी राजवंश के जमाने का हो सकता है। हालांकि मंदिर की स्थापत्य कला को देखकर ऐसा लगता है कि प्रतिमाएं भले ही कलचुरी राजवंश के जमाने की हो लेकिन मंदिर का निर्माण 16वी 17वीं शताब्दी में गोंडवाना शासको के कार्यकाल में हुआ होगा। इस तरह की यह मंदिर दो अलग-अलग राजवंशों की समयक्ष की कहानी को समेटे हुए प्रतीत होता है । जिन्हें वीर गणेश बुलाते हैं वही पहुंच पाते हैं मंदिर परिसर में स्थित 16 भुजाओं वाली गणेश प्रतिमा को वीर गणेश भी कहा जाता है और ऐसी मान्यता है कि जी भक्त को वीर गणेश बुलाते हैं वही भक्त मंदिर तक पहुंच पाता है। इसलिए कई बार लोग इस सड़क तो गुजर तो जाते हैं लेकिन इस मंदिर को ना तो देख पाते हैं और ना ही इसके अंदर दर्शनों के लिए पहुंच पाते हैं। धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है
भले ही इस ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिर को पुरातत्व विभाग के संरक्षण में दे दिया गया हो लेकिन मंदिर के रखरखाव और सौंदर्यीकरण पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया जिसकी कारण मंदिर की चारों तरफ जहां कच्चे पक्के मकान बन गए हैं वहीं कुछ लोगों ने तो मंदिर की भूमि पर ही कब्जा कर रखा है। जिस टीले नुमा पहाड़ी पर यह मंदिर स्थापित है उसके पीछे पहाड़ी का क्षरण भी हो रहा है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो मंदिर के अस्तित्व को ही खतरा उत्पन्न हो सकता है यदि इसके रखरखाव और सौंदर्यीयकरण पर ध्यान देकर रिसीव विकसित कर दिया जाए तो यह शहर के लिए एक बड़ी धार्मिक पर्यटन की सौगात हो सकती है।







