जबलपुरमध्य प्रदेश

गरीबी क्या होती है, एक रात तो रूक लो हमारे साथ ….कोरोना…. से नहीं… पेट की भूख से डरते हैं

ग्वारीघाट के पास झोपड़ी बनाकर रह रहे लोग गरीबी को मान रहे अभिशॉप

विशेष खबर…


यशभारत संवादददाता, जबलपुर। दुख्खी बाई अपने झोपड़ीनुमा घर के बाहर सिर पर हाथ रखे आने-जाने वाले लोगों को काफी देर से देख रही है. मानो उसे इस बात का इंतजार है कि आने वाला कोई व्यक्ति लॉकडाउन समाप्त होने की खबर दे, जिससे वह कबाड़ बीनने निकल सके और घर वालों के लिए राशन व्यवस्था कर सकें। घर का चूल्हा भी जला सके। दुख्खी बाई जैसे बहुत ऐसे गरीब है जिन्हें दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने में पसीना आ रहा है। भीख मांगकर और मजदूरी करके गुजर-बसर करने वाले लोगों के लिए कोरोना संक्रमण काल आफत बनकर टूटा है। दुख्खी बाई सिर्फ एक उदाहरण है. जबलपुर में ऐसे कई गरीब हैं, जिनके पेट के लिए कोरोना की बीमारी आफत बनकर टूटी है।

ग्वारीघाट के आसपास रहने वाले रतनलाल कुमार रिक्शा चलाते हैं। आज घर के बाहर बच्चों को उछलते-कूदते देखकर समय काट रहे हैं। रतनलाल कहते हैं, गांव से शहर रिक्शा चलाने यह सोचकर आए थे कि यहां ज्यादा कमा लेंगे, तो जीवन गुजर जाएगा, लेकिन अब लोग कह रहे हैं कि मई महीने तक यही स्थिति रहेगी। अब रतनलाल ना घर जा पा रहे हैं और ना ही यहां रिक्शा चला पा रहे हैं। वे कहते हैं, जो जमा पैसा था, उससे तो दो-चार दिन चल जाएगा, लेकिन उसके बाद क्या होगा? कोई उधार देने वाला भी नहीं है, जिससे मांगकर काम चला सके।

बासा खाना खाते है जिससे भूख न लगे
ग्वारीघाट के पास झोपड़ी बनाकर रह रहे मजूदर धनीराम से पूछा गया तो वह कैसे लॉकडाउन में अपना और अपने परिवार का पेट भरते हैं। इस सवाल पर धनीराम थोड़ा गुस्सा हुए, पहले तो कुछ भी बताने से इंकार कर दिया। लेकिन कुछ देर बाद खुद ही आंखे भरकर बताने लगे कि इस कोरोना संक्रमण आपदा की घड़ी में दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मंहगा साबित हो रहा है। बासा खाना खाते है जिसकी वजह से कहते है कम भूख लगती है। दूसरी वजह यह भी है कि कहीं से ज्यादा खाना मिल जाता है तो उसको रखकर दो दिन खाते रहते हैं। धनीराम कहते हैं कि खाना खराब भी हो जाता है परंतु पेट की भूख आगे खराब खाना भी अच्छा लगता है।

पापा जाते मांगने तो खा लेते हैं नहीं तो भूखे सो जाते हैं
11 साल की पूजा इस महामारी में अपने परिवार का भरपूर साथ दे रही है। पूजा बताती है कि पापा उसके भीख मांगने जाते हैं अगर कहीं से खाना मिल जाता है तो पूरा परिवार खा लेता है नहीं तो पानी पीकर सो जाते हैं। लॉकडाऊन नहीं था वह दूसरों के घरों में काम करके दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर लेती थी। परंतु अब इस समय काम नहीं मिल रहा है। पूजा कहती है कि इस समय किसी घर के जाओ तो डांटकर भगा देते हैं, कहीं से कोई मदद नहीं मिलती है।

कहीं काम भी नहीं है और न कोई मददगार
पवन यादव,रतन लाल बताते हैं कि लॉकडाऊन में सर्वाधिक परेशानी हम गरीबों को जा रही है। कहीं कोई काम नहीं है और न ही कहीं से मदद मिल रही है। पवन का कहना है कि पिछले साल के लॉकडाऊन में तो सामाजिक संस्थाएं आगे आकर भोजन बांट रही थी, हर जरूरत वस्तुएं बांट रही थी इस बार तो सामाजिक संस्थाएं नजर नहीं आ रही है और न ही प्रशासन से किसी भी तरह की मदद मिल रही है। भूखे मरने की नौबत है, खुद का पेट भर नहीं पा रहे हैं परिवार का पेट कहां से भरे समझ नहीं आ रहा है कि इस संकट की घड़ी में किसके पास जाए।


कोरोना से डर नहीं लगता है, भूख से लगता है
ग्वारीघाट के पास झोपड़ी बनाकर रहे गरीब बेसहारा लोग कोरोना से नहीं डर रहे हैं, उन्हें डर लग रहा है तो वह पेट की भूख से। लॉकडाऊन से अब तक की अवधि में लोगों के पास खाने के लाले पड़े हुए हैं। किसी के पास दाल है तो किसी के पास चावल। कुछ ऐसे भी लोग है जिनके पास सिर्फ आटा है और उसी की रोटी बनाकर वह नमक के साथ या फिर कच्चे आम के साथ खा रहे हैं। हैरानी इस बात पर है कि इन गरीबों की परेशानी किसी को नजर आ रही है। जनप्रतिनिधि से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। अपनी बेबसी पर आंसू बहा रहे इन लोगों का कहना है कि पूरी नहीं थोड़ी बहुत मदद तो मिल जाए जिससे हलक में सांसें चलती रहे हैं।

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